भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 270

अध्याय. उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन १९३ “दशास्यो विंशतिभुजो बभूव क्षणदाचरः। स परिव्राजकच्छद्म महाकायो विहाय तत्॥ प्रतिपेदे स्वकं रूपं रावणो राक्षसाधिपः॥” (वा० रा० ३।४९।८,९) अर्थात् अपना छद्ममय परिव्राजक रूप त्याग कर दस मुख, बीस भुजावाले अपने वास्तविक रूप को प्राप्त हो गया। यह भी उल्लेख है कि जटायु ने रावण की दस बाहुओं को काट डाला, परन्तु वरदान के प्रभाव से पुनः अन्य दस-दस बाहु उत्पन्न हो गयीं— “जटायुस्तमतिक्रम्य तुण्डेनास्य खगाधिपः। वामबाहून् दश तदा व्यपाहरदरिन्दमः॥ संछिन्नबाहोः सद्यो वै बाहवः सहसाऽभवन्। विषज्वालावलीमुक्ता वल्मीकादिव पन्नगाः॥” (वा० रा० ३।५१।३८,३९) ‘संछिन्नबाहोः कर्तितबाहोः टीका रामाभिरामी।’ रावण के दस सिर और बीस भुजाएँ उपर्युक्त वचनों से प्रमाणसिद्ध हैं। उनका अलाप करना या उन्हें कल्पनामात्र या रूपकमात्र कहना परम दुःसाहस है। महर्षि को मिथ्यावादी मानना और उन्हीं के काव्य का विचार करना शुद्ध अज्ञता ही है। इतना ही नहीं, त्रिशिरा नाम का एक अन्य राक्षस भी लङ्का में था। उसके तीनों सिर तीन किरीटों से ऐसे लगते थे जैसे तीन काञ्चन पर्वतों से युक्त हिमवान् शोभित हो। “त्रिभिः किरीटैस्त्रिशिराः शुशुभे स रथोत्तमे। हिमवानिव शैलेन्द्रस्त्रिभिः काञ्चनपर्वतैः॥ (वा० रा० ६।६९।२४) किसी ग्रन्थ के सम्बन्ध में मूलग्रन्थ की उपेक्षा कर अपनी दुष्कल्पनाओं से किसी अंश को प्रक्षिप्त, किसी अंश को रूपक और किसी अंश को अज्ञानमूलक कहना अत्यन्त अनुचित है। इस तरह तो बाइबिल और बुल्के की रामकथा में ऐसी दुष्ट कल्पनाएँ की जा सकती हैं। अनुच्छेद ११३ में भूगोल पर विचार करते हुए बुल्के लिखते हैं कि वाल्मीकि दक्षिण तथा मध्य भारत के भूगोल से अपरिचित थे। इसका प्रमाण रामायण को पढ़कर मिलता है।” तथापि वे अपने कथन के समर्थन में रामायण के किसी प्रसङ्ग को उद्धृत नहीं करते, अतः उक्त कथन निष्प्रमाण ही है। सिंहलद्वीप एवं लङ्का भिन्न-भिन्न हैं, यह भवभूति, मुरारी तथा राजशेखर के ग्रन्थों के एवं वराहमिहिर की बृहत्संहिता के अनुसार भी सिद्ध है। बौद्ध- साहित्य में सिंहलद्वीप को लङ्का कहा गया हो तो वह प्रमाणसिद्ध नहीं। बुल्के आगे लिखते हैं कि “अधिकांश आधुनिक लेखक रामायण की लङ्का और किष्किन्धा दोनों को मध्यभारत में रखते हैं।” यह कथन भी निराधार है। मध्यभारत स्थित किसी लङ्का में जाने के लिए हनुमान् को समुद्र पार नही करना पड़ता। यदि समुद्रोलङ्घन का वर्णन ही मिथ्या है तो पाश्चात्यों की रामायण के विरुद्ध दुरभिसन्धिपूर्ण कल्पनाएँ सुतरां मिथ्या ही हैं। सुतरां ऐसी कल्पनाओं से पूर्ण मिथ्या ग्रन्थ पर विचार कर समय का अपव्यय करना भी असङ्गत ही है।

उत्तरकाण्ड आदि को प्रक्षिप्त ठहरानेवाले तर्काभासों का खण्डन

अपनी पुस्तक रामकथा के आठवें अध्याय के ११४ अनुच्छेद में रामायण के क्षेपक अथवा प्रक्षिप्त अंश को दिखाते हुए बुल्के लिखते हैं, “रामायण के प्रायः समस्त आलोचक उत्तरकाण्ड को प्रक्षिप्त मानते हैं और इसके लिए भिन्न भिन्न तर्क प्रस्तुत करते हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण इस प्रकार हैं— २५