भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पद्मपुराण (उत्तरखण्ड १६९।९३-९५), रामरहस्य (अ० ३) आदि में भी इसी तरह का प्रतिपादन है। रामरहस्य आदि को अर्वाचीन कहना भी असङ्गत है। इसी तरह आनन्दरामायण (३।९।४७) में “बभूवस्तुश्चक्रदरो कैकेयीसूनुलंक्षणान्तकश्च।।” में भरत को चक्र और शत्रुघ्न को शङ्ख कहा गया है। उदारराघव (सर्ग २), तत्त्वसंग्रहरामायण (१।१४) तथा काश्मीरीरामायण (२।१३) में भी भरत और शत्रुघ्न को क्रमशः चक्र और शङ्ख का अवतार माना गया है। इस परिवर्तन को कल्पान्तरीय ही मानना उचित है। इसी तरह लिङ्गपुराण (२।५।१४७, १४८) तथा अद्भुतरामायण (४।६६, ६७) में भरत और शत्रुघ्न को विष्णु की दाईं और बाईं बाहुओं का अवतार माना गया है। इसका अभिप्राय यही है कि वे दोनों राम की दाईं और बाईं भुजाओं के तुल्य सहायक एवं प्रिय हैं। जैसा कि वाल्मीकिरामायण में लक्ष्मण के सम्बन्ध में कहा गया है कि वे राम के बहिर्श्वर प्राण ही थे—“नित्यं प्राणो बहिश्चरः ।'” पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ का यह कथन कि चक्र भरत हैं और शङ्ख लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न दोनों के रूप अवतीर्ण हुए हैं, प्रामाणिक नहीं है, क्योंकि भारत की ही सुनी सुनायी बातों का पाश्चात्यों ने विकृतरूप में वर्णन किया है । रामकियेन (अ० २) के अनुसार भरत को चक्र और शत्रुघ्न को गदा मानना भी वैसा ही है । सारला- दास के उड़ियामहाभारत वनपर्व (पृ० २२८) में विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र तथा महादेव राम, शत्रुघ्न, भरत तथा लक्ष्मण के रूप में प्रकट हुए, इस कथन का आधार उपनिषद् ही हैं। रामतापनीय उपनिषद् आदि के अनुसार विराट् ब्रह्मा का शत्रुघ्न रूप स्वीकृत है। राम को शुद्ध ब्रह्म, विष्णु या इन्द्र को भरत और अव्याकृत महादेव को लक्ष्मण कहा जा सकता है। तारसार उपनिषद् के अनुसार शिव का हनुमान् के रूप में, विष्णु का सुग्रीव के रूप में तथा ब्रह्मा का जाम्बवान् के रूप में एवं नाद, बिन्दु, कला, कलातीत तथा परतत्त्व तत्त्वों का शत्रुघ्न, भरत, लक्ष्मण, सीता और राम के रूप में प्रादुर्भाव माना गया है । (देखिये उपनिषद्ब्रा० में) बुल्के का यह कहना अशुद्ध है कि अवतारवाद का विकास हुआ है । रामतापनीय उपनिषद्, जो सनातनी जगत् की दृष्टि में वेद है, उसमें राम को परब्रह्म का अवतार माना गया है, अतएव राम को अवतार मानना विकास नहीं है, किन्तु स्वाभाविक वस्तु का वर्णन है। बुल्के साहब के परम प्रमाण युद्धकाण्ड में भी राम को ऋत ब्रह्म स्वरूप ही माना गया है ! “अक्षरं ब्रह्म सत्यं च मध्ये चान्ते च राघव ।” (वा० रा० ६।११७।१४) “त्वं त्रयाणां हि लोकानामादिकर्ता स्वयंप्रभुः । ........त्वमोङ्कारः परात्परः ॥” (६।११७।१८, १९) । पद्मपुराण (पातालखण्ड अ० ४६) में राम का शिव से यह कहना ठीक है कि हममें और तुममें अन्तर (भेद) समझनेवाले अज्ञ हैं, ऐसे लोगों को नरक की यातना भोगनी पड़ेगी । बुल्के ऐसी बातों से परस्पर शास्त्रवचनों का विरोध दिखाकर अवतारवाद को अर्वाचीन कल्पनामात्र कहना चाहते हैं। परन्तु वे समन्वय की पद्धति न जानने के कारण ही ऐसी भ्रान्तियों से ग्रस्त हुए हैं । “ममासि हृदये शर्व भवतो हृदयं त्वहम् । आवयोरन्तरं नास्ति मूढाः पश्यन्ति दुर्धियः ॥ ये भेदं विदधत्यद्धा आवयोरेकरूपयोः । कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते नराः कल्पसहस्रकम् ॥” (पद्मपु० पातालखं० ४६।२०, २१) यह ठीक ही है। कृत्तिवासरामायण के अनुसार दुर्गा का यह कहना भी ठीक ही है कि राम शिव के गुरु हैं, उनमें भेद नहीं है। रामचरितमानस में भी शिव एवं राम को अभिन्न कहा गया है । वहाँ तो शिवजी को