भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 704

अध्याय उत्तरकाण्ड ६२७ पउमचरियं के अनुसार हनुमान् ने वरुण के १०० पुत्रों को कैद कर लिया था। पर्व ५० में हनुमान् ने अपने दादा महेन्द्र को सेना सहित पराजित किया था। स्कन्दपुराण (ब्राह्मखण्ड धर्मारण्यमा० अ० ३६,३७) में हनुमान् के प्रभाव से धर्मारण्य के निवासियों की सुख-शान्ति तथा हनुमान् द्वारा कुम्भीपाल की पराजय से वहाँ के ब्राह्मणों की सुरक्षा का वर्णन है। आनन्दरामायण (राज्यकाण्ड सर्ग १८) के अनुसार राम ने ब्राह्मणों को रामनाथपुर का राज्य प्रदान किया तथा हनुमान् को उनकी सहायता के लिए नियुक्त किया। बाद में हनुमान् ने देवालय की पाषाण मूर्ति से प्रकट होकर एक दुष्ट राजा को शूली पर चढ़ाया था। आनन्दरामायण (मनोहरकाण्ड सर्ग १२२) में स्त्रीराज्य की कथा मिलती है। एक रामभक्त ब्राह्मण की सहायता के लिए प्रकट होकर हनुमान् ने अपने गर्जन से ही सब पुरुषों को मार डाला, जिससे उस देश का स्त्रीराज्य नाम पड़ा। भावार्थरामायण (७।१) में भी हनुमान् को राम द्वारा स्त्रीराज्य में भेजने की कथा है। यह भी कहा जाता है कि वीरमाता अञ्जना ने अपने दूध की धारा से एक पर्वतश्रेणी को बहा दिया था। रामायण में हनुमान् के लिए सचिवोत्तम, मन्त्रिसत्तम, पिङ्गाधिपमन्त्री, कपिराजहितकर, प्लवङ्गाधिप- मन्त्रिसत्तम आदि विशेषण आते हैं। प्रज्ञासूचक विशेषणों में मतिमान्, महामति, महाप्राज्ञ, मेधावी, बुद्धिमतां वरिष्ठ, धीमान्, साधुबुद्धि, अचिन्त्यबुद्धि, वाक्यज्ञ, वाक्यविशारद आदि विशेषण विशेषरूप से आते हैं। हनुमान् संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं के विद्वान् थे। अशोकवाटिका में वे इसी लिए संस्कृत नहीं बोलते कि संस्कृत बोलने से सीता उन्हें रावण न समझ लें— “वाचं चोदाहरिष्यामि मानुषीमिह संस्कृताम् । यदि वाचं प्रदास्यामि द्विजातिरिव संस्कृताम् ॥ रावणं मन्यमाना मां सीता भीता भविष्यति । अवश्यमेव वक्तव्यं मानुषं वाक्यमर्थवत् ॥ (वा० रा० ५।३०।१७,१८) ६८९ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “हनुमान् की विभिन्न शास्त्रों में पहुँच का उल्लेख मूलरामायण में नहीं रहा होगा। हनुमान् की जन्म-कथा में उनको सर्वशास्त्रविदांवर की उपाधि दी गयी है (वा० रा० ४।६६।२) ।” सर्वत्र ही बुल्के को अपनी अनर्गल बात को सिद्ध करने के लिए रामायण 'की कथाओं को क्षेपक कहना पड़ता है। अन्यथा वाल्मीकिरामायण में तो हनुमान् को सर्वशास्त्रविदों में श्रेष्ठ कहा ही गया है। वाल्मीकिरामायण ४।५४।५ में भी हनुमान् को सर्वशास्त्रविशारद कहा गया है। अन्य स्थलों में भी हनुमान् की तत्त्वज्ञता वर्णित है— “निश्चितार्थोऽर्थतत्त्वज्ञः कालधर्मविशेषवित् ।” (वा० रा० ४।२९।६) तथा— “विदिताः सर्वलोकास्ते” (वा० रा० ४।४४।४)। बुल्के कहते हैं कि अधिक संभव है कि ये बाद के प्रक्षेप हों, पर वे सात जन्म लेकर भी हनुमान् की सब शास्त्रों में पहुँच नहीं थी, इसमें कोई प्रमाण नहीं बतला सकते । उत्तरकाण्ड की कथा में अगस्त्यजी ने राम को स्पष्ट बताया ही था कि हनुमान् ने सूर्य भगवान् से व्याकरणादि वेदाङ्ग, वेद, छन्द आदि का अध्ययन कर सब को धारण किया था । परन्तु बुल्के के पास इन सबको प्रक्षेप कहने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है। महाभारत आरण्यक पर्व में भी हनुमान् और भीम के संवाद में हनुमान् को शास्त्रज्ञ कहा गया है। वे भीम को चार युगों (अध्याय