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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 801

सीता और राम दोनों अभिन्न थे । उनमें असन्तोष का प्रश्न ही कहाँ ? राम प्रपञ्च के निर्माता होते हुए भी अधिष्ठानरूप से प्रपञ्चातीत ही थे। वाल्मीकि और तुलसी ही क्यों सभी ब्रह्मविद्वरिष्ठ ऋषि, मुनि आदि आस्तिक राम के प्रशंसक थे और हैं। श्रीराम 'दासोऽहं' के 'द' का अपहरण करके अधिकारियों में सोऽहं की भावना जगाते हैं। राम को आदर्श मानकर उनका अनुसरण करने से ही पाखण्ड का अन्त हो सकता है। राम सम्पूर्ण विश्व के माता, पिता एवं गुरु होते हुए भी अवतारवाद के सिद्धान्तानुसार दशरथनन्दन, कौशल्यानन्दवर्धन तथा वसिष्ठ के प्रिय शिष्य थे। राम छली नहीं, कूटमयी माया के पति और छल-छद्म के भेदक थे। लक्ष्मण सीता के अनुगत देवर 'रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम् ।' के अनुसार राम को पिता एवं सीता को माता मानते थे। सीता रावण के विनाश के लिए रावण के साथ गयी भी हो तो भी कोई बाधा नहीं है। जगज्जननी विश्वकल्याणकारिणी सीता रावण का भी हित चाहती थी। तभी उन्होंने रावण के प्रति राम के अनन्त प्रभाव एवं तेज का वर्णन किया था। सीता लक्ष्मण की माता के तुल्य हितकारिणी थी। सीता सर्वकारण शक्ति होने से वन में, रण में सर्वत्र ही हैं और होंगी। सर्वव्यापी राम का वनगमन नाटक ही तो है। सीता सर्वत्र ही हैं। फिर लङ्का में ही क्यों ? सर्वहितैषिणी हैं फिर लक्ष्मण की भी हितैषिणी होना युक्त ही है। राम का नाम दुर्वृत्तियों का विनाशक तथा सद्वृत्तियों का विधायक है। सीता सर्वकारण शक्ति अयोनिजा ही हैं। जगज्जननी सीता में सबकी स्वाभाविकी भक्ति युक्त है। भक्ति में उत्कर्ष सब को ही अभीष्ट है। सीता के निन्दक को गर्दभियों में भी स्थान दुष्प्राप्य है। रावण तथा लङ्का दोनों सीता-द्रोह के कारण नष्ट हो गये। लङ्का-निवास के कारण सीता की निन्दा करनेवाला अभिशप्त रजक ही था। सीता रामचन्द्र की चन्द्रिका ही हैं। सीता परम पुरुष राम की अनन्या हैं। सीता और राम के अखण्ड दिव्य दाम्पत्य से विश्वमङ्गल हुआ। सीता असङ्ग चिद्रूपिणी होने पर भी सर्वाभ्युदयरूपिणी भी थी। ऋषियों एवं ब्राह्मणों पर अभक्ष्य भक्षण का दोषारोपण करनेवाला विड्वराह ही हो सकता है। भरत की माता कैकेयी के कारण ही रामायण बन सकती थी। कोल, भिल्ल, निषाद आदि सबके कल्याणार्थ ही सीता और राम का वनवास था। सीता और राम का ध्यान करने से सब रोगों की निवृत्ति तथा स्वर्णिम भगवत्प्रेम प्राप्त होता है। रामचरित सुनकर कापुरुषों में भी शौर्य जाग्रत् होता है। सर्वव्यापी, सर्वद्रष्टा राम के दर्शनमात्र से सब दोष दूर होते हैं। हनुमान् केसरी के क्षेत्र अञ्जना के गर्भ से उत्पन्न वातात्मज थे। हर नारी को दुराचारिणी कहनेवाला स्वयं को ही जारज सिद्ध करता है। वनमानव का लेखक श्रुति, स्मृति और पुराण के प्रमाण बिना सीता के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करनेवाला कुदानव ही है। उसने कलुषित मनो- वृत्तियों के कारण राम के उपासकों, पूजकों, तथा भक्तों को ठेस पहुँचायी है।

रामचरित्र के सम्बन्ध में वर्तमान इतिहास का चञ्चु-प्रवेश नहीं हो सकता

इस देश में रामायण की घटनाओं की प्रामाणिकता के विषय में निरर्थक विवाद उपस्थित कर अपने को अधिक लोकप्रिय बनाने का प्रयास चल रहा है। कुछ दिन पहले भारतीय संस्कृति के मूल मन्त्र मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम की लीला के बदले रावणलीला मनाने का अभियान भी चला था। भारतीय बौद्धिक वर्ग ही ने इस प्रश्न का बौद्धिक स्तर पर उत्तर दिया और वह अभियान बन्द करना पड़ा। अब पुनः डाक्टर सांकलिया एवं उनके जैसे कुछ नवीन पुरातत्त्वविदों ने रामायण की कतिपय घटनाओं तथा विशिष्ट स्थानों की प्रामाणिकता तथा उनके सम्बन्ध में नये सूत्रों के अन्वेषण के बाद विवाद उठाया है। डाक्टर सांकलिया ने वाल्मीकीय रामायण को पूर्ण प्रामाणिक ग्रन्थ माना है। वे उसे महाकाव्य मानते हैं। परन्तु उसमें वर्णित सेतुबन्धन, हनुमान् द्वारा समुद्र पार गमन, अंगूठी का प्रसङ्ग, लङ्का की स्थिति तथा कुछ ऐसी ही घटनाओं को वे अप्रामाणिक तथा काल्पनिक मानते हैं। इस सम्बन्ध में उनके तर्क अत्यन्त आधारहीन तथा परस्परविरोधी ज्ञात होते हैं।