भारतकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 807

७२० रामायणमीमांसा एकविंश आस्तिक सम्प्रदायों ने वेदादि-शास्त्रों के प्रामाण्य का सर्वोत्कृष्ट महत्त्व माना है। वेदादि-शास्त्रों का ही परमसार श्रीरामचरितमानस है। शास्त्रों का अमुक अंश ही आदरणीय है, अमुक नहीं, यह आस्तिकता नहीं है। वेदादि- शास्त्रों के महातात्पर्य का विषय 'परब्रह्म' रामचरितमानस के 'राम' हैं। उनका परम-पवित्र चरित्र ही रामचरित- मानस का वर्णनीय विषय है। राम के सम्बन्ध से ही रावण का भी चरित्र वर्णनीय कोटि में आता है; तभी तो- “चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥” के अनुसार शतकोटिप्रविस्तर रामायण का एक-एक अक्षर महापातकों को नष्ट करने की सामर्थ्य रखता है। फलतः रावण के चरित्र का वर्णन भी रामचरित्र का अङ्ग होने के नाते ही पापनाशन में सक्षम है, अतएव अनुष्ठान में सबका पाठ होता है। श्रीवाल्मीकिरामायण के सभी श्लोक संपुटितरूप से अनुष्ठान में पठनीय होते हैं। वेदों का प्रत्येक अक्षर सार्थक एवं सप्रयोजन है; यह उत्कृष्ट मीमांसापद्धति से सिद्ध है। ठीक वैसे ही रामचरितमानस का प्रत्येक अक्षर सार्थक एवं सप्रयोजन है। उसके किसी एक वाक्य को भी निरर्थक या गौण नहीं मानना चाहिये। वेदादि-शास्त्रों को भगवान् का वाङ्मय विग्रह माना जाता है। महाभारत तथा श्रीभागवत के सम्बन्ध में भी ऋषियों की वैसी ही धारणा है। भगवान् के वाङ्मय शरीर वेद, रामायण, भारत, भागवत में कोई नयी वस्तु डाल देना, वैसा ही अनिष्ट होगा, जैसे भगवान् के उपास्य विग्रह में कांटा चुभाना । उसमें से कुछ अंशों को प्रक्षिप्त कहकर निकाल देना भी वैसा ही अनिष्ट होगा, जैसे भगवान् के विग्रह से किसी अङ्गोपाङ्ग को पृथक् कर देना । ठीक उसी तरह रामचरितमानस भी भगवान् श्रीराम का विग्रह है, अतः उसमें नये अंश का सन्निवेश एवं विद्यमान अंशों का बहिष्कारण भी पूर्वोक्त नीति से अनुचित होगा। रामचरितमानस का नियमित अनुष्ठान होता है। वह आज का पवित्र धर्म-ग्रन्थ है। अतः उसके किसी अंश को उपेक्षणीय या अपरिपक्व विचार की परिणति नहीं कहा जा सकता है। श्रद्धा और अन्धविश्वास में यही अन्तर होता है कि वेदादि-शास्त्रों एवं तदनुसारी गुरुओं के वचन में विश्वास श्रद्धा है। अप्रामाणिक वस्तुओं में विश्वास अन्ध श्रद्धा है। यह ठीक है कि किसी एक प्रसङ्ग या कुछ पंक्तियों के आधार पर ही मानस का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, किन्तु सम्पूर्ण मानस के उपक्रम, उपसंहार की एकरूपता, अभ्यास, फल, अपूर्वता, अर्थवाद और उपपत्ति का विचारकर उसका निष्कर्ष निकाला जा सकता है, तो भी उन कुछ पंक्तियों का भी समन्वय करना पड़ेगा। उन्हें उपेक्षणीय नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह भी मानस का अङ्ग ही है। उसका भी अनुष्ठान होता है। पर यदि ऐसा न हो सका तो अवश्य ही उन कुछ अंशों एवं पंक्तियों का दुरुपयोग होगा । मानस वेद, रामायण, महाभारत, पुराण तथा धर्मशास्त्रों के समन्वयात्मक अध्ययन का ही परिणाम नहीं, किन्तु सम्प्रदायपरम्पराप्राप्त सुनिश्चित परिपक्व सिद्धान्त में परिनिष्ठित, प्रामाणिक अधिकृत साक्षात् भगवान् शङ्कर और हनुमान्जी महाराज का प्रसादस्वरूप है- “सपनेहु साचेहु मोहि पर जो हर गौरि पसाउ । तौ फुर होउ जो कहउँ सब भाषाभनिति प्रभाउ ॥” ( रा० मा० १।१५) अतः उसके आधार पर द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत आदि सिद्धान्तों का विश्लेषण भी अनुचित नहीं, किं बहुना धर्मनीति, राजनीति तथा व्यवहारों के औचित्य अनौचित्य का विश्लेषण भी अनुचित नहीं। “ढोल गँवार सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी ॥” ( रा० मा० ५।५८।३ ) वस्तुतः उक्त पंक्ति भी निरर्थक नहीं, वह भी तुलसी-साहित्य की उपेक्षणीय वस्तु नहीं है। वह बटलोई के किसी कोने के कच्चे चावल के एक कण के समान नहीं है। यदि बटलोई के सब चावल पके हैं, तो एक चावल