झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ झांसी की रानी 'हिश ! (डैमइट) वह तो गधो का झुण्ड है। फिर भी मैं तुम्हारी बात मानता हू। इसलिये नही कि रानी-वानी से डरता हूं, किन्तु इसलिये कि प्याले के ऊपर मीठा-मीठा पवन बहना चाहिये न कि बहस-मुवाहिसे की गरम आधी। वरना मै अपनी पूरे महीने की तनखाह की होड़ लगाता। तो भी मेजर, मैं सुनता हू राजा नाचता अच्छा था। किसी ज़माने में, और उसकी नाटकशाला में बडी सुन्दर शकले थी। बहुत बढिया नाच।' 'हम सब जानते हैं, पर देखा नही है। वैसे और हिन्दुस्थानी नर्तकियो का नाच बहुत देखा। मगर मजा नही आता। इस देश के नाच तक में कोई ढङ्ग नही, कोई मोहकता नही।' 'पर नर्तकिया हैं हसीन। मैं शर्त लगाता हूँ, नाच-गान चाहे उनका उतना खूबसूरत न हो।' 'ये लोग हमारे नाचने-गाने को भद्दा समझते है। मैंने हिन्दुस्तानियो का अपने नृत्यग्रह में आना बन्द कर दिया है। केवल नवाब अलीबहादुर आता है। वह समझदार है।' 'सिर तो जरूर हिलाता है।' 'ओह ! बहुत काम का आदमी है। तुम जानने हो।' 'वह अपने दो-एक दोस्तो को साथ लाना चाहता है।' 'वेकार है। मैं पसन्द नही करता।' 'यहा से ले क्या जावेगा ?' 'हम लोगो की स्त्रियो के वारे में बुरा ख्याल फैलावैगा !' 'कोई परवाह नही। बुरा ख्याल फौज और पुलिस में नही फैलना चाहिये।' 'एक से एक बढकर वे दिमाग हैं। उन कारतूमो को मुँह से खोलने से इन्कार किया तो हमने रगड दिया। रह गये। जितना वेतन हम इन लोगो को देते हैं, उतना इनको दुनिया में कही भी नहीं मिल सकता।'