झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ झांसी की रानी तात्या—'बहुत दिन हुए, जब मैं रानी साहब को लखनऊ, दिल्ली की परिस्थिति सुना गया था।' रानी—'तुम लोग मुझसे रानी साहब मत कहा करो। अच्छा नही लगता।' 'तात्या—'बाईसाहब कहूँगा।' नाना—'दिल्ली का हाल मै सुनाता हू। बादशाह वृद्ध है। अपनी स्थिति से बहुत दुखी है। मन के महाकष्ट को कविता में होकर घटाता रहता है। उसके राजकुमार कुछ होनहार जान पडते हैं, परन्तु दिल्ली के राजकुमारो में जिस आयु में प्राय घुन लग जाता है कदाचित इनको भी लग जावेगा।' रानी—'ग्वालियर ?' नाना—'राजा का अभी लडकपन है। अङ्गरेज प्रवन्ध कर रहे हैं।' रानी—'इन्दौर ?' तात्या—'इन्दौर मै गया था। वहा का तो कचूमर ही निकल गया है।' रानी—'हैदराबाद ?' तात्या—'वहा नही गया। परन्तु इतना निर्विवाद समझिए कि हैदराबाद अङ्गरेजो का परम भक्त है। जनता अपने साथ है।' रानी—'पजाब की सिक्ख रियासते ?' नाना—'वहा मैं कही कही गया। सिक्खो में अङ्गरेजो को पछाडने की शक्ति होते हुए भी, फूट इतनी विकट है और राजा इतने स्वार्थान्ध हैं कि अङ्गरेज उस ओर से बिलकुल निश्चिन्त रह सकते हैं।' रानी—'और झाँसी में तो अब कुछ है ही नही। जो कुछ है भी सभव है कि, हाथ में न रहे।' नाना—'झाँसी में ही तो हम लोगों का सब कुछ है। मनू—बाई साहब, झाँसी ही तो हम लोगो की एक आशा है।' लक्ष्मीबाई के फीके होठो पर वही विलक्षण मुस्कराहट क्षीण रूप में आई।