झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 18, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ७ [ २ ] रघुनाथराव के उपरान्त राज्य के लिये चार मुख्य दावेदार खड़े हुये- गङ्गाधरराव ( भाई ) कृष्णराव ( रामचन्द्रराव का कथित दत्तक पुत्र ) अलीबहादुर और रघुनाथराव की विधवा रानी । कृष्णराव की पीठ पर सखूबाई थी । बन्दीगृह के जीवन ने सखूबाई का दमन नही कर पाया था, प्रत्युत वह अधिक सतर्क, सतेज, और सन- कीली हो गई थी । रघुनाथराव की अन्त्येष्टि क्रियायें भी साङ्गोपाङ्ग न हो पाई थी कि सखूबाई ने किले पर अधिकार कर लिया, खज़ाने पर अपने सन्त्री बिठला दिये, तोपो पर अपने तोपचियो को और सिलहखाने पर अपने सिलेदारो को नियुक्त कर दिया । गङ्गाधरराव शहर वाले महल में थे । उनको ऐसा लगता था जैसे अपने ही घर में कैद हो । सखूबाई को कैद करने का निर्णय जिन लोगो ने दिया था उनमें गङ्गाधरराव भी थे । सखूबाई की प्रतिहिंसा के भय से, और साधन-हीन होने के कारण गङ्गाधरराव झांसी से भागे और अङ्गरेजो के पास सीधे कानपूर पहुंचे । उस समय कानपूर अङ्गरेजो की बढ़ी हुई शक्ति का काफी बड़ा अड्डा था । अलीबहादुर ने करेरा के दुर्ग में शरण ली और वह वहा से सैन्य संग्रह करने लगे । उस समय मध्य भारत के लिये गवर्नर जनरल का एजेन्ट साइमन फ्रेज़र था—सन् १८५७ के विप्लवकाल में यह आगरे का लैफ्टि- नेंट गवर्नर हो गया था । इस गडबड की ख़बर पाकर फ्रेज़र झांसी आया । कम्पनी सरकार के प्रबल सगठन और बल के आतंक ने उसके कर्मचारियो को उद्धत बना दिया था । वह दो एक चोबदारो को लेकर सखूबाई के पास क़िले में पहुचा और उसने सखू को धमकाया ।