झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४२३
करके आरी नामक ग्राम के पास से यह टोली आगे गई। पहूज नदी मिली। लोगो ने चुल्लुओ से पानी पिया और फिर आगे बढे। कभी धीमी गति से कभी तेजी के साथ। जब दस बारह मील निकल आये तब ये लोग कुछ क्षण के लिये ठहरे। रानी ने जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह से कहा, 'अब आप लोग लौट जाओ और सेना एकत्र करके मुझे कालपी में आकर मिलो।' रघुनाथसिंह ने तुरन्त कहा, 'यह कार्य दीवान जवाहरसिंह अच्छा कर सकते है। मैं तो साथ चलूँगा।' रानी मान गई। जवाहरसिंह ने उनके पैर छुये और कटीली की ओर चला गया। रानी की टोली आगे बढी। इसमें गुलमुहम्मद और उसके कुछ पठान भी थे। जनरल रोज को रानी के निकल जाने का पता बहुत शीघ्र लग गया। उसने तुरन्त लैफ्टिनेण्ट बोकर नामक अफसर को कुछ गोरो और निज़ाम हैदराबाद के एक दस्ते के साथ रानी का पीछा करने के लिये भेजा। मोरोपन्त भाडेरी फाटक से निकल कर अन्जनी की टौरिया तक आया, परन्तु जैसे ही यहाँ लडाई छिडी, उसने समझ लिया कि हाथी महान सकट का कारण होगा। उसने दतिया की दिशा मे हाथी को मोड दिया और जितनी तेजी सम्भव थी उतनी तेजी के साथ भागा। कुछ अंग्रेज़ सवारो ने पीछा किया। उसकी जांघ मे किसी घुडसवार की तलवार का घाव भी लगा, परन्तु वह निकल गया और सवेरे दतिया पहुँच गया। एक तंबोली के यहा ठहरा। परन्तु छिपाये छिप नही सकता था। राज्याधिकारियो को मालूम हो गया। राज्य ने हीरे जवाहर सब जब्त कर लिये और मोरोपन्त को पकड़ कर तुरन्त झासी भेज दिया। रोज़ ने दिन के दो बजे जलते हुये महल और भस्मीभूत पुस्तकालय के वीचो बीच मोरोपन्त को फाँसी दे दी !