रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
पृष्ठ 10, कुल 362 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ४ ]
द्वितीयाध्याय-में आठ महारसों के भेद, गुण, शोधन तथा मारण और उनकी उत्पत्ति का अत्यन्त सुन्दर वर्णन है। यथा—
अभ्रवैक्रान्तमाक्षीकविमलाद्रिजसस्यकम् । चपलो रसकश्चेति....................................॥
तृतीयाध्याय-में अष्ट उपरसों की उत्पत्ति, भेद, गुण, शोधन तथा उनके प्रयोगों का वर्णन है । यथा—
"गन्धाश्मगैरिकासीसकाङ्क्षीतालशिलाञ्जनम् । कङ्कुष्ठं चेत्युपरसाः....................................॥
चतुर्थाध्याय-में रत्नों के भेद, नाम, गुण, शोधन, मारण और प्रयोगों का वर्णन है। यथा—
वैक्रान्तः सूर्यकान्तश्च हीरकं मौक्तिकं मणिः । चन्द्रकान्तस्तथा चैव राजावर्तश्च सप्तमः ॥ गरुडोद्गारकश्चैव ज्ञातव्या मणयस्त्वमी । पुष्परागो गोमेदश्च पद्मरागः प्रवालकम् ॥ वैदूर्यं च तथा नीलः................................॥
पञ्चमाध्याय-में शुद्धलोह ( स्वर्ण, रजत, ताम्र, लौह अर्थात् मुण्ड, तीक्ष्ण, कान्त ), पूतिलोह ( नाग, वङ्ग ) और मिश्रलोह ( पित्तल, कांसा, भरत, रूक्मलोह ) की उत्पत्ति, भेद, गुणदोष, शोधन, मारण और प्रयोगों का वर्णन है ।
षष्ठाध्याय-में शिष्योपनयन, रसविद्या गुरुलक्षण, शिष्य और अनुचरों का गुण, रसशाला और रसमण्डप का निर्माण, रसलिङ्ग की स्थापना, पूजन और ध्यान, शिष्यदीक्षादानविधि, कालिनीलक्षण और होमविधि का वर्णन है ।
सप्तमाध्याय-में रसशालानिर्माण, उपरस, महारस, अष्ट लोह और उपकरणों की पूजाविधि, पद्महस्तवैद्यादिकों का लक्षण तथा रससाधनीय पदार्थों का वर्णन और परिचारकों के लक्षण का वर्णन है।
अष्टम व नवम अध्याय-में क्रमशः परिभाषावर्णन, व दोलायन्त्र, विद्याधरयन्त्र, घटयन्त्र, पातनयन्त्रादिकों का वर्णन है ।