रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ रसरत्नसमुच्चये-
नागादि अष्ट दोष और पर्पव्यादि सप्तकञ्चुक दोष
नागो वङ्गो मलो वह्निश्चाञ्चल्यञ्च विषं गिरिः । असह्याग्नि र्महादोषा निसर्गाः पारदे स्थिताः ॥ र० सा० सं० भेदी द्रावी मलकरी ध्वांक्षी पर्पटीका च सा । अन्धकारी पाटनिका कञ्चुकाः सप्त कीर्तिताः ॥ र० त०
मिला दिये। उस समय से आज तक यह सूत बिना संस्कारों के सिद्धि देने वाला नहीं होता है । जल के समान द्रव रूप होने से जल के साथ गमन शील है । चाञ्चल्य होने से हंस के समान गमन शील है । मल रूप होने से मलादि दोषों के साथ मिल जाता है । अग्नि आदि से तप्त करने पर धूम के समान उड़न शील हो जाता है । इन चार प्रकार की गतियों के सिवाय पांचवीं भी अदृश्यरूप रस की गति है । उस गति के कारण देहरूप कोष से (अण्डाद्) आत्मा की तरह निकल जाता है । अर्थात् जिस तरह से मृत्यु के समय आत्मा की गति का ज्ञान किसी को भी नहीं होता है इसी तरह रस की पांचवीं गति अदृश्य है । वह रस जीवों (प्राणियों) को प्राण दान करने से जीव कहलाता है ।
पारद की उपर्युक्त जलग, हंसग, धूमग, मलग, रूप चारों गतियों का प्रत्यक्ष दर्शन होता है किन्तु पांचवीं गति अदृश्य है । परन्तु वह पांचवीं गति रस-रक्षामन्त्र और रसध्यान से रोकी जाती है । उक्त प्रकार से भिन्न २ गति होने के कारण पारद का संस्कार करना कठिन है । इस लिये निपुण वैद्य का कर्तव्य है कि वह उन संस्कारों की रक्षा करे ॥ ८०-८४ ॥
रसरक्षामन्त्रः—
ओं अघोरेभ्योऽथघोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यश्च । सर्व्वतः सर्वसर्वेभ्यो नमस्ते रुद्ररुपिभ्यः ॥ र० सा० सं०
ध्यानप्रकारः—
हृद्व्योमकर्णिकाऽन्तःस्थं रसेन्द्रं परमेश्वरि ? । स्मरन्विमुच्यते पापैः सद्यो जन्मान्तरार्जितैः ॥ र० चि० म०
अथ रसस्य स्थानान्तरगतिवर्णनम्—
प्रथमे रजसि स्नातां हयारूढां स्वलंकृताम् । वीक्षमाणां वधूं दृष्ट्वा जिघृक्षुः कूपगो रसः ॥ ८५ ॥ उद्गच्छति जवात्सोऽपि तं दृष्ट्वा याति वेगतः । अनुगच्छति तां सूतः सीमानं योजनोन्मितम् ॥ ८६ ॥