भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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३० रसरत्नसमुच्चये—

शनैरुद्घाटयेद्यन्त्रमूर्द्ध्वस्थालीगतं रसम् ।
कर्पूरवत्सुविमलं गृह्णीयाद् गुणवत्तरम् ॥ ( इति भावप्रकाश )

भावार्थ— शुद्ध पारद, गैरिक, ईंट का चूर्ण, खरिया मिट्टी, फिटकरी, सेंधा नमक, हिरमिजी (एक प्रकार की लाल मिट्टी जो मिट्टी के बर्तन रंगने में व्यवहृत होती है सब द्रव्य समान लेकर पारद के अतिरिक्त अन्य सब द्रव्यों को पीस कर कपड़छान करके पारद के साथ मिलाकर एक प्रहर (३ घण्टे) तक घोटें। तथा घोटे हुए द्रव्यों को एक मजबूत हाण्डी में रखें और उस पर ठीक जमने वाली दूसरी हाण्डी मुंह की ओर से ढक दें। बाद में कपड़ा और मिट्टी कूटकर मिलाकर जल में घोल के उससे उक्त दोनों इंडियों के मुख बन्द करके बाद में सुखावं । सूखने पर फिर कपरोटी कर दें। सन्धि इस प्रकार बन्द करें कि जिससे पारद वाष्पी भवन के समय निकल न सके । सन्धि लेप के भली प्रकार सूखने पर निरन्तर चार दिन तथा चार रात तक बबूल की लकड़ी की आंच दें । स्वाङ्ग शीतल होने पर सावधानी से सन्धि खोलकर ऊपर की हंडी में कर्पूर के जैसे लगे हुए द्रव्य को धीरे से निकाल लें। यह फिरङ्ग (सिफलिस) उपदंश आदि के लिये उत्तम योग है ।

रस कर्पूर की नव्य निर्माणविधि—

आधुनिक विधि में केवल पारद और खाने का साधारण नमक यथावश्यक मात्रा में लेकर और उड़ाकर रसकर्पूर बनाते हैं । आंच देने की प्राचीन विधि ही कुछ परिवर्तन के साथ व्यवहृत की जाती है । इसमें पारद १०० भाग के साथ नमक की गेस क्लोरिन १८ भाग मिली रहती है । इसको पाश्चात्य चिकित्सक औषधि में केलोमल के नाम से व्यवहार करते हैं इसे सब—क्लोराइड ऑफ मर्करी भी कहते हैं । इसका प्राचीन नाम रसकर्पूर था किन्तु आज कल 'पर—क्लोराइड आफ़ मर्करी' के लिये यह नाम व्यवहृत होता है, जिसमें पारद के साथ क्लोरीन की मात्रा ३५॥ होती है और इसका व्यवहार भी उपदंश, फिरङ्ग आदि में बहुतायत से होता है। यह बहुत उपयोगी औषध है । मेरे विचार में दोनों की निर्माणविधि साधारण दृष्टि से समान होने के कारण रसकर्पूर संज्ञा दोनों में व्यवहृत होती है; किन्तु यह भूल है। दोनों रासायनिक दृष्टि से भिन्न भिन्न गुण धर्म वाले द्रव्य हैं और एक दूसरे के स्थान पर कभी किसी का व्यवहार नहीं करना चाहिये । इनका नाम भी स्पष्ट रीति से अलग अलग कर देने आवश्यक हैं। आधुनिक रसकर्पूर 'पर क्लोराइट आफ़ मर्करी' या, कोरोसिब सब्लीमेण्ट, के लिये रसकर्पूर और केलोमल ( सब क्लोराइड आफ़मर्करी ) के लिये सुधानिधिरस या रसपुष्प नाम व्यवहार में लाने चाहिये, जिससे दोनों द्रव्यों का भ्रम दूर हो जावे और औषधि के व्यवहार में हानि न उठानी पड़े । इन नामों का उपयोग "रसतरङ्गिणी" कार ने किया है।