भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 362 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 124

३४

-रसरत्नसमुच्चये-

( ४ ) लेहर बेकाइट ( Lehrbachite a Selenide of Lead and mercury ) यह सेलेनाइड, सीसा ( नाग Lead ) और पारद का यौगिक है ।

( ५ ) आयोडोराइट ( Iodyrite ) यह अत्यल्प मात्रा में चीली ( Chile ) नामक स्थान पर आयोडाइड, रजत, और पारद का यौगिक पाया जाता है । आयुर्वेद के रस-शास्त्रों में हिंगुल के शीर्षक में जो वर्णन मिलता है वह समस्त पारद के खनिजों के विषय में समझना चाहिये । पारद के मुख्य खनिज तो स्पष्ट रूप से लिख दिये हैं और गौण खनिज उन्हीं के अन्तर्गत करने का प्रयत्न किया गया है । आज कल भी प्रधान खनिजों से ही पारद निकालने का व्यवसाय चलता है । शेष खनिज किसी देशविशेष के स्थानविशेष में मिलते हैं । उनका उपयोग पारद निकालने के लिये कभी २ किया जाता रहा है ।

इसका वर्णन रस शास्त्रियों ने एक श्लोक के अर्धभाग में कर दिया है ।

“पिण्डरूपमिदं साक्षात् दृश्यते दृष्टि सौख्यदम्।” ( रसकामधेनु पृ० २७३ )

इन सब अवतरणों को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्राप्य रसग्रन्थों में हिंगुल के वर्णन में जितना भी साहित्य मिलता है वह सब ठीक है, केवल ग्रन्थ संग्राहात्मक होने के कारण सिलसिले वार खनिजों का स्वरूप समझना कठिन हो गया है । तथापि जितनी सामग्री उपलब्ध है उससे यह निर्णय सहज में निकाला जा सकता है कि प्राचीन भारतीय रस-शास्त्रियों को पारद प्राप्ति के प्रायः सारे खनिज विदित थे ।

उन्होंने उनका इतना ही वर्णन किया है कि जितना औषधि निर्माता के ज्ञान के लिये आवश्यक है । आधुनिक काल में भी औषधियों के गुणधर्म बतलाने वाली पुस्तकों ( मेटेरिया मेडिका आदि ) में औषधि निर्माणोपयोगी खनिजों का वर्णन संक्षेप में दिया गया है । परन्तु खनिज सम्बन्धी वैज्ञानिक ग्रन्थों में बहुत विस्तार के साथ सूक्ष्मातिसूक्ष्म वर्णन पाया जाता है । सम्भवतः इसी प्रकार यहां के खनिज शास्त्रों में भी विशद वर्णन रहा हो पर दैव दुर्विपाक से आज कल उपलब्ध नहीं है ।

रस शास्त्रियों ने औषधोपयोगी खनिजों का संक्षेप में परिचय देकर उनके शोधन मारण और औषधि गुण धर्म पर विशेष प्रकाश डालने का प्रयास किया है । वैद्यों का यह अभिमान ठीक हो सकता है कि गत भारतीय संस्कृति के समय में जब देश की उन्नत दशा रही हो, सर्वत्र ज्ञान प्रसार करने का कार्य यहाँ के विद्वान् करते रहे हों, पर आज कल की पारतन्त्र्य दशा में उक्त अभिमान छोड़कर रसशास्त्रोक्त खनिजों का वर्तमान कालिक उपलब्ध ज्ञान प्राप्त करना वैद्य मात्र के लिये परमावश्यक है । क्योंकि जो औषधि के द्रव्य बाज़ार में आ रहे हैं वे प्रायः कृत्रिम और अशुद्ध मिलते हैं । पन्सारी उनमें अनेक वाह्य अशुद्धियां मिलाकर बेचते हैं । ऐसी दशा में पूर्णतया