रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः । ४५
सेन्टाक्लेरा कौन्टि ( Santa clara county )
इस प्रान्त में न्यू एल्माडन की खानों का पता सन् १८२४ में लग गया था, किन्तु सन् १८४५ तक यहां के पारदीय खनिज हिङ्गुल की पहिचान न हो सकी। यहां की खानों से पारद की बडी मात्रा निकलने का उल्लेख अन्यत्र किया जा चुका है। इस समय तक १८ कूप ( Shapcha ) खोदे गये हैं। यहां के भूगर्भवर्ती कन्दराओं की लम्बाई १०० मील के लगभग है। इन कन्दराओं में से अनेक कन्दराएँ अपने आप बैठ भी गई हैं। सन् १९१७ में सब से अधिक गहराई २४५० फुट मानहिल नामक पहाड़ी की चोंटी जो १६०० फुट ऊँची है के नीचे थी। इस लिये संसार में यह सब से बड़ी और गहरी खान गिनी जाती है। ८०० फुट गहराई के नीचे का भाग कुछ वर्ष हुए बन्द कर दिया गया है। स्पेन की अल्माडन खानों के हिङ्गुल की अपेक्षा यहां का माल अत्यन्त निम्न-श्रेणी का है, जिसमें केवल ॥ से १ फीसदी तक पारद पाया जाता है। इस खान का वर्णन पढ़कर यह सहज में ही समझ में आजाता है। कि इस ग्रन्थ ( रस रत्न समुच्चय ) में जो “शतयोजननिम्नास्ते जाताः कूपास्तु पञ्च च” लिखा है, वह कहां तक सत्यता युक्त है। संसार में अनेक परिवर्तन होते रहते हैं। उस समय पारद निकालने के केवल पांच ही कूप खुदे मिले होंगे। आज यहां पर अठारह कूप खुदे पाये जाते हैं। शतयोजन निम्न मानना इस दशा में ठीक हो सकता है कि पृथिवी के उप-रितल से जो पारद निकालने के लिये भूगर्भ में खुदाई की गई वह खुदाई नापकर जोड़ने से शतयोजन अर्थात् ४५०० मील के लगभग गहराई समझी जावे। आजकल भी इसी प्रकार की मापने की प्रथा प्रचलित है। योजन शब्द से चार कोस साधार-णतया माने जाते हैं, किन्तु इसका भी शास्त्रीय विचार करने से पता लगता है कि एक योजन ४ मील नौ सौ साठ गज का होता है। मेदिनीकारने “योजनं परमात्मनि चतुष्कोश्यां च योगे च” लिखा है, जिससे चार कोस स्पष्टतया माना है। इसी प्रकार तारानाथ ने “स्याद्योजनं क्रोशचतुष्टयेन” लिखा है। लीलावती में भी विशेष गणना करके चार कोस ही का योजन माना है। किन्तु उस गणना से ३२००० हाथ का योजन होता है। हाथ के नाप के लिए मान शास्त्र में १२ अंगुल का हाथ माना है। लीलावती और मान शास्त्र की संज्ञाओं में कुछ भेद है।
“द्वादशाङ्गुलिकाहस्त तद्द्वयन्तु शयः स्मृतः ।
<div align="right">( मानशास्त्र )</div>
तच्चतुष्कं धनुः प्रोक्तं क्रोशो धनुःसहस्रिकः ॥
तच्चतुष्कं योजनं स्यात् ....................”
इस हिसाब से १६००० हाथ का १ योजन होता है।