रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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रसरत्नसमुच्चये—
अथाभ्रभेदाः— पिनाकं नागमण्डूकं वज्रमित्यभ्रकं मतम् । श्वेतादिवर्णभेदेन प्रत्येकं तच्चतुर्विधम् ॥ ४ ॥
अभ्रक पिनाक, नाग, मण्डूक और वज्र इन भेदों से चार प्रकार का है, और ये हरेक चारों भेद चार २ प्रकार के हैं । जैसे श्वेत, अरुण, श्याम और पीत । कुछ लोगों का मत है कि अभ्रक श्वेतादि भेद से चार तरह का है किन्तु श्याम (कृष्ण) अभ्रक पिनाकादि चार भेदों वाला होता है ॥ ४ ॥
अथ पिनाकादीनां लक्षणानि— पिनाकं पावकोत्तप्तं विमुञ्चति दलोच्चयम् । तत्सेवितं मलं बद्ध्वा मारयत्येव मानवम् ॥ ५ ॥ नागाभ्रं नागवत्कुर्याद्ध्वनिं पावकसंस्थितम् । तद्भुक्तं कुरुते कुष्ठं मण्डलाख्यं न संशयः ॥ ६ ॥ उत्प्लुत्योत्प्लुत्य मण्डूकं ध्मातं पतति चाभ्रकम् । तत्कुर्यादश्मरीरोगमसाध्यं शस्त्रतोऽन्यथा ॥ ७ ॥ वज्राभ्रं वह्निसन्तप्तं निर्मुक्ताशेषवैकृतम् । देहलोहकरं तच्च सर्वरोगहरं परम् ॥ ८ ॥
पिनाक अभ्रक अग्नि में तपाने से पत्ररूप में पृथक हो जाता है । उस को सेवन करने से मल का अवरोध होता है । इससे मृत्यु भी हो जाती है । नागाभ्रक अग्नि पर रखने से सर्प की तरह शब्द (फूं फूं) करता है । उसके सेवन से मण्डलाकार कुष्ठ उत्पन्न होता है । मण्डूक संज्ञक अभ्रक अग्नि में तपाने पर मण्डूक के समान उछल २ कर भागता है । उसके सेवन करने से दवासे असाध्य परन्तु शस्त्रादि कर्म से साध्य अश्मरी रोग उत्पन्न होता है । वज्र संज्ञक अभ्रक अग्नि में तपाने पर भी किसी भी विकृति को प्राप्त नहीं होता है । वह शरीर को अत्यन्त दृढ बनाता है तथा सब रोगों का नाशक है ॥ ५-८ ॥
अथ वर्णभेदेनाभ्रकस्य भेदास्तेषां क्रियाविषयश्च— श्वेतं रक्तं च पीतं च कृष्णमेवं चतुर्विधम् । श्वेतं श्वेतक्रियासूक्तं रक्ताभं रक्तकर्मणि ॥ पीताभमभ्रकं यत्तु श्रेष्ठं तत्पीतकर्मणि ॥ ९ ॥