भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 362 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 157

द्वितीयोऽध्यायः । ६७

मारणे प्रकारान्तरमाह—
गन्धर्वपत्रतोयेन गुडेन सह भावितम् ।
अधोध्वं वटपत्राणि निश्चन्द्रं त्रिपुटैः खगम् ॥ ४३ ॥
क्षुधं करोति चात्यर्थं गुञ्जार्धमितिसेवया ।
तत्तद्रोगहरैर्योगैः सर्वरोगहरं परम् ॥ ४४ ॥

यदि अभ्रक में गुड़ मिला कर एरण्ड (रेडी) के पत्तों के स्वरस की भावना देकर शराव में रख कर ऊपर से वट पत्र रख कर शराव को कपड़ मिट्टी कर फूंक दे । इस तरह तीन पुट देने से अभ्रक की निश्चन्द्र भस्म तय्यार होती है । इस भस्म को आधे रत्ती की मात्रा में सेवन करने से अत्यन्त क्षुधा लगती है और यह भस्म भिन्न २ दवाइयों या अनुपान के साथ देने से सर्व व्याधियों को दूर करती है ॥ ४३-४४ ॥

अथ सत्वस्य शोधनमारणे—
सत्त्वस्य गोलकं ध्मातं सस्यसंयुक्तकाञ्जिके ।
निर्वाप्य तत्क्षणेनैव कुट्टयेल्लोहपारया ॥ ४५ ॥
संप्रताप्य घनस्थूलकणान्क्षिप्त्वाऽथ काञ्जिके ।
तत्क्षणेन समाहृत्य कुट्टयित्वा रजश्चरेत् ॥ ४६ ॥
गोधृतेन च तच्चूर्णं भर्जयेत्पूर्ववत्त्रिधा ।
धात्रीफलरसैस्तद्वद्धात्रीपत्ररसेन वा ॥ ४७ ॥
भर्जने भर्जने कार्यं शिलापट्टे न पेषणम् ।
ततः पुनर्नवावासारसैः काञ्जिकमिश्रितैः ॥ ४८ ॥
प्रपुटेद्दशवाराणि दशवाराणि गन्धकैः ।
एवं संशोधितं व्योमसत्त्वं सर्वगुणोत्तरम् ।
यथेष्टं विनियोक्तव्यं जारणे च रसायने ॥ ४९ ॥
द्रुतयो नैव निर्दिष्टाः शास्त्रे दृष्टा अपि दृढम् ॥
विना शंभोः प्रसादेन न सिध्यन्ति कदाचन ॥ ५० ॥

अभ्रक सत्व का गोला बना कर उसे प्रतप्त करें और फिर बिना छानी काञ्जी में बुझावे और उसी समय लोह के मूसल से चूर्ण करता जाय । इस तरह अभ्रक सत्व के स्थूल कणों को बार २ प्रतप्त कर के काञ्जी में बुझा कर उसी समय निकाल