भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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५४ रसरत्नसमुच्चये—

माक्षिक अम्ल तथा कुछ कसैला और मधुर, पाक में शीतवीर्य कटु और लघु होता है। इन दोनों प्रकार के माक्षिक का सेवन करने से मनुष्य जरा व्याधि और विष से आक्रान्त नहीं होता है ॥ ७४ ॥

अथ माक्षिकभेदाः—

माक्षिको द्विविधो हेममाक्षिकस्तारमाक्षिकः ।
तत्राऽऽद्यं माक्षिकं कान्यकुब्जोत्थं स्वर्णसन्निभम् ॥ ७५ ॥
तपतीतीरसम्भूतं पञ्चवर्णसुवर्णवत् ।
पाषाणबहुलः प्रोक्तस्ताराख्योऽल्पगुणात्मकः ॥ ७६ ॥

माक्षिक धातु सुवर्ण और रजत का भाग मिलने से दो तरह का होता है। इनमें प्रथम सुवर्ण माक्षिक जो कि कान्यकुब्ज ( कन्नोज या कानपुर ) देश की खानों से निकलता है सुवर्ण के समान होता है। किन्तु तापी नदी के तट के पास की खानों से निकाला हुआ सोनामाखी धातु पांच रङ्ग वाला तथा सुवर्ण सदृश होता है, रौप्यमाक्षिक में पत्थर का भाग ज्यादा होता है तथा वह अल्प गुणदायक है ॥७५-७६॥

**विमर्शः—**भारतवर्ष में माक्षिक कोयलों की खानों में मिलता है। आचार्यों ने इसके तीन भेद बताये हैं किन्तु इस पन्थ में इसके दो ही भेद हैं। तथा आगे विमल ( रौप्यमाक्षिक ) के तीन भेद किए हैं किन्तु यह अन्य रसग्रन्थों से विरुद्ध है।

"माक्षिको द्विविधो हेममाक्षिकस्तारमाक्षिकः” ( इति० र० र० स० )
१ स्वर्णमाक्षिक—कापरं पेराइटिज़् ( Copperpyritis Cu,fes 2 )
२ रोप्यमाक्षिक ( विमल )—आयर्न पेराइटिज़् ( Iron pyritis )
३ कांस्यमाक्षिक ( आर्सेनो पेराइटिज़् Arsano pyritis )

ये तीनों खनिज ताम्र, लौह, और संखिये के गन्धित हैं। इनमें से गन्धक निकाल देने से उक्त तीनों पदार्थों की प्राप्ति होती है। यद्यपि इनमें अन्य खनिज भी रहते हैं किन्तु प्रधान रूप में उपर्युक्त ही होते हैं। इस लिये इनकी भस्म बनाने में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है। यद्यपि बजार में आने वाले स्वर्ण तथा रौप्य माक्षिक में दोनों ( स्वर्णरजत ) की मात्रा नहीं होती है। किन्तु विदेशों से कुछ इनके अधिक मूल्य खनिज आते हैं उनमें दोनों धातुओं का कुछ अंश रहता है इसलिये रस शास्त्रों में जहां २ स्वर्ण और चांदी के भस्म के अभाव में इन दोनों का ग्रहण करना हो तब उक्त अधिक मूल्यवान माक्षिक खनिजों की भस्म बनाकर प्रयोग करना चाहिये।