भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 362 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 232

१४२ रसरत्नसमुच्चये—

उत्पन्न करता है, वृष्य है, वात-पित्त और कफ की शान्ति करता है, समग्र रोगों का नाश करता है, हीरक भस्म पारद के बन्धन, मारण और उसके गुणों को बढ़ाती है, अग्नि को दीप्त करती है, हीरा मृत्यु को नष्ट करता है। यह एक प्रकार का अमृत ही है ॥ ३३ ॥

रत्नदोषाः— ग्रासस्त्रासश्च बिन्दुश्च रेखा च जलगर्भता ।
सर्वरत्नेष्वमी पञ्च दोषाः साधारणा मताः ॥
क्षेत्रतोयभवा दोषा रत्नेषु न लगन्ति ते ॥ ३४ ॥

सब प्रकार के रत्नों में ग्रास, त्रास, बिन्दु, रेखा, जलगर्भता ये पांच दोष स्वाभाविक ही होते हैं, परन्तु खान और जल के दोष रत्नों में नहीं होते हैं ॥ ३४ ॥

अथ वज्रशोधनम्— कुलत्थक्वाथके स्विन्नं कोद्रवकथितेन वा ।
एकयामावधि स्विन्नं वज्रं शुध्यति निश्चितम् ॥ ३५ ॥

हीरे को एक प्रहर तक दोलायन्त्र द्वारा कुलत्थी या कोदोधान के क्वाथ में स्वेदन करने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ ३५ ॥

अथ वज्रमारणम्— वज्रं मत्कुणरक्तेन चतुर्वारं विभावितम् ।
सुगन्धिमूषिकामंसैर्वर्तितैः परिवेष्ट्य च ॥ ३६ ॥
पुटेत्पुटैर्वराहाख्यैस्त्रिंशद्वारं ततः परम् ।
ध्मात्वा ध्मात्वा शतं वारान्कुलत्थक्वाथके क्षिपेत् ।
अन्यैरुक्तःशतं वारान्कर्त्तव्योऽयं विधिः क्रमात् ॥ ३७ ॥

शुद्ध हीरे को खटमल के रक्त से चार वार भावित कर छूछूंदर के मांस में लपेट कर मूषा में बन्दकर ऊपर से कपड़ मिट्टी कर वाराह पुट की विधि से ३० पुट देवे' पश्चात् पुट से निकाल कर अग्नि में प्रतप्त कर कुलत्थ के काढ़े में १०० वार बुझावें । कुछ लोगों का मत है कि मत्कुण रक्त की भावना से लेकर प्रतप्त कर कुलत्थ क्वाथ में बुझाने तक जो विधि है उसे क्रम से सौ वार करना चाहिए॥३७॥

मतान्तरेण मारणम्— कुलत्थक्वाथसंयुक्तलकूचद्रवपिष्टया ।