भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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चतुर्थोऽध्यायः । १४७

रत्नप्रयोगः— रसे रसायने दाने धारणे देवतार्चने । सुलक्ष्याणि सुजातीनि सर्वाण्युक्तानि शोधयेत् ॥ २ ॥ रत्नों का प्रयोग रस, रसायन, दान, धारण, देवताओं की पूजन में श्रेष्ठजाति और शुभलक्षणों वाले रत्नों का शोधन कर प्रयोग करना चाहिये ॥ २ ॥

रत्नानां साधारणशोधनम्— शुद्धिं चरन्ति रत्नानि निम्ब्वम्बुनि तुषाम्बुनि । विशुध्यन्ति त्रिदिवसैर्विधृतानि च सर्वशः ॥ ३ ॥ प्रायः सर्व प्रकार के रत्नों को निम्बू के स्वरस या काञ्जी में तीन दिन तक भींगों देने से वे अच्छी तरह शुद्ध हो जाते हैं ॥ ३ ॥

अथ वैदूर्यम्—श्रेष्ठवैदूर्यलक्षणम्— वैदूर्यं श्यामशुभ्राभं समं स्वच्छं गुरु स्फुटम् । अभ्रशुभ्रोत्तरीयेण गर्भितं शुभमीरितम् ॥ ५७ ॥ जो वैदूर्यमणि कालापन लिये हुए श्वेत, समानाकार, निर्मल, तौल में भारी, तेज युक्त और जिसके भीतर श्वेतरंग की रेखाएं हों वह उत्तम होती है ॥ ५७ ॥

हेयवैदूर्यलक्षणम्— श्यामं तोयसमच्छायं चिपिटं लघुकर्कशम् । रक्तगर्भोत्तरीयं च वैदूर्यं नैव शस्यते ॥ ५८ ॥ जो वैदूर्य काली, जल के समान छाया वाली ( प्रभावहीन ), चिपटी, वजन रहित, स्पर्श में खुरदरी और मध्य में जिसके लाल रेखाएं हों वह अशुभ है ॥ ५८ ॥

अथ गुणाः— वैदूर्यं रक्तपित्तघ्नं प्रज्ञायुर्बलवर्धनम् । पित्तप्रधानरोगघ्नं दीपनं मलमोचनम् ॥ ५६ ॥ वैदूर्यमणि रक्तपित्त और पित्त के प्रधान ( मुख्य ) रोगों (अम्लपित्त) को शान्त करती है। बुद्धि, आयु और बल को बढ़ाती है, मलावरोध को नष्ट करती है तथा पाचकाग्नि को दीप्त करती है ॥ ५९ ॥

अथ रत्नशुद्धिः— शुद्ध्यत्यम्लेन माणिक्यं जयन्त्या मौक्तिकं तथा।