रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५६ | रसरत्नसमुच्चये—
प्रमेह को नष्ट करती है, क्षीण पुरुषों को पुष्ट करती है, बुद्धि को स्फुट करती है और वीर्य को बढाती है ॥ ९ ॥
स्वर्णगुणाः—
स्निग्धं मेध्यं विषगदहरं बृंहणं वृष्यमग्र्यं
यक्ष्मोन्मादप्रशमनपरं देहरोगप्रमाथि ।
मेधावृद्धिस्मृतिसुखकरं सर्वदोषामयघ्नं
रुच्यं दीप्तिप्रशमितरुजं स्वादुपाकं सुवर्णम् ॥ १० ॥
सुवर्ण स्निग्ध, वृष्य, बृंहण, मेध्य है और विषबाधा को नष्ट करता है, वह्नि का दीपक, यक्ष्मा का नाशक और शरीर के रोगों का नाशक, मेधा, (स्मरण शक्ति) बुद्धि, स्मृति, सुख का उत्पादक सम्पूर्ण दोष और रोगों का नाशक, रुचिकारक है और वह्नि को दीप्तकर रोगों की शान्ति करता है तथा स्वादुपाक होता है ॥ १० ॥
अशोधितामारितस्वर्णदोषाः—
सौख्यं वीर्यं बलं हन्ति रोगवर्गं करोति च ।
अशुद्धममृतं स्वर्णं तस्माच्छुद्धं च मारयेत् ॥ ११ ॥
अशुद्ध और विना भस्म किया हुआ सुवर्ण सेवन करने से सौख्य, वीर्य और बल का नाश होता है तथा रोग समूह को उत्पन्न करता है इसलिये प्रथम शोधन कर भस्म करना चाहिए ॥ ११ ॥
स्वर्णशोधनम्—
कर्षप्रमाणं तु सुवर्णपत्रं शरावरुद्धं पटुधातुयुक्तम् ।
अङ्गारसंस्थं प्रहरार्धमानं ध्मातेन तत्स्यान्ननु पूर्णवर्णम्॥ १२॥
एक कर्ष (एक तोला) सुवर्ण के पत्र (वर्क) में गन्धक या सेंधा नमक और गेरू समान भाग मिलाकर शराव में बन्दकर आधे प्रहर तक धोंकनी से तेज अग्नि में फूंकने से सुवर्ण शुद्ध होकर श्रेष्ठ वर्ण का हो जाता है ॥ १२ ॥
लोहमारणार्थमुत्तमद्रव्यकथनम्—
लोहानां मारणं श्रेष्ठं सर्वेषां रसभस्मना ।
मूलीभिर्मध्यमं प्राहुः कनिष्ठं गन्धकादिभिः ।
अरिलोहेन लोहस्य मारणं दुर्गुणप्रदम् ॥ १३ ॥
स्वर्णादि आठ प्रकार के लोहों का पारद भस्म के साथ मारण करना श्रेष्ठ है