रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 362 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० रसरत्नसमुच्चये—
निकृष्टरौप्यलक्षणम्—
दाहे रक्तं च पीतं च कृष्णं रूक्षं स्फुटं लघु ।
स्थूलाङ्गं कर्कशाङ्गं च रजतं त्याज्यमष्टधा ॥ २६ ॥
जो चान्दी तपाने से लाल, पीत और कृष्ण मालूम हो तथा रूक्ष, हलकी, खात युक्त, मोटे अङ्ग वाली और कठोर हो वह त्याज्य है ॥ २६ ॥
अथ रौप्यगुणाः—
रूप्यं विपाकमधुरं तुवराम्लसारं
शीतं सरं परमलेखनकं च रूप्यम् ।
स्निग्धं च वातकफजिज्जठराग्निदीपि
वल्यं परं स्थिरवयस्करणञ्च मेध्यम् ॥ २७ ॥
चांदी के गुण—
चांदी पाक में मधुर, कषाय, अम्लरस वाली और शीतल, दस्तावर, शरीर के भेद को नष्ट करने वाली, स्निग्ध वात और कफ के रोग को नष्ट करने वाली, जठराग्नि की दीपक, बलदायक, अत्यन्त बुद्धिवर्द्धक और अवस्था बढ़ाने वाली होती है ॥ २७ ॥
अथ गुणान्तरम्—
रौप्यं शीतं कषायाम्लं स्निग्धं वातहरं गुरु ।
रसायनविधानेन सर्वरोगापहारकम् ॥ २८ ॥
चान्दी शीतल, कषाय, अम्ल, स्निग्ध, वातहर, गुरु और रसायन विधि से सब रोगों का नाश करने वाली है ॥ २८ ॥
स्वर्णादिशोधनम्—
तैले तक्रे गवां मूत्रे ह्यारनाले कुलत्थजे ।
क्रमात्तन्निषेचयेत्तप्तं द्रावे द्रावे तु सप्तधा ॥
स्वर्णादिलोहपत्राणां शुद्धिरेषा प्रशस्यते ॥ २९ ॥
स्वर्णादि-लोह पत्रों को प्रतप्त कर तिलतैल, मट्ठा, गोमूत्र, काञ्जी, कुलत्थक्वाथ इन में से प्रत्येक में सात २ वार बुझाना चाहिए । इस तरह सोना और चान्दी के पत्रों की शुद्धि करना श्रेष्ठ है ॥ २९ ॥