रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६२ | रसरत्नसमुच्चये—
में बन्दकर दें फिर कपड़मिट्टीकर वालुकायन्त्र द्वारा तीव्र अग्नि में एक दिन तक पकावें। साङ्ग शीत होने पर चांदीके पत्रों को निकाल कर घोट लें फिर उसमें समान शुद्ध हरताल डालकर निम्बू के रस में घोट कर सम्पुट में रख फूंक दे, इस तरह १२ पुट देने से चांदी की भस्म हो जाती है ॥ ३४-३५ ॥
अन्यविधिः— माक्षीकचूर्णलुङ्गाम्लमर्दितं पुटितं शनैः । त्रिंशद्वारेण तत्त तारं भस्मसाज्जायतेतराम् ॥ ३६ ॥
अथवा चांदी का चूर्ण और समान शुद्ध सुवर्णमाक्षिक चूर्ण इन दोनों को निम्बूके रस में घोट कर सम्पुट कर के ३० पुट देने सेउत्तम भस्म हो जाती है॥३६॥
रौप्यस्यनिरुत्थभस्मीकरणम्— भाव्यं ताप्यं स्नुहीक्षीरैस्तारपत्राणि लेपयेत् । मारयेत्पुटयोगेन निरुत्थं जायते ध्रुवम् ॥ ३७ ॥
अथवा थूहर के दुग्ध से सोनामाखी को पीसकर चांदी के पत्रों पर लेप कर दें फिर पुट के विधान से फूंकने पर चांदी की निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥३७॥
अन्यविधिः— तारपत्रं चतुर्भागं भागैकं शुद्धतालकम् । मद्यं जम्बीरजद्रावैस्तारपत्राणि लेपयेत् ॥ ३८ ॥ शोधयेदन्धयन्त्रे च त्रिंशदुत्पलकैः पचेत् । चतुर्दशपुटैरेवं निरुत्थं जायते ध्रुवम् ॥ ३९ ॥
अथवा चार भाग चांदी के पत्रों पर एक भाग शुद्ध हरताल को जम्बीर के रस से घोट कर लेप कर दें, फिर उन्हें अन्धमूषा में रख कर तीस उपलों की आंच में पुट देवे, इस तरह १४ पुट देने से निश्चय ही चांदी की निरुत्थ भस्म हो जाती है ॥ ३८-३९ ॥
स्वर्णरौप्ययोर्द्रवणम्— सप्तधा नरमूत्रेण भावयेद्देवदालिकाम् । तच्चूर्णावापमात्रेण द्रुतिः स्यात्स्वर्णतारयोः ॥ ४० ॥
**सुवर्णरजतद्रुतिः—**देवदाली (वन्दाल) को मनुष्य के मूत्र में सात वार घोट कर अग्नि में पिघले सुवर्ण या रजत के अन्दर डालने से दोनों की द्रुति हो जाती है ॥ ४० ॥