रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६६ | रसरत्नसमुच्चये—
ताम्र पत्रों पर निम्बू रस में पिसे हुए समान पारद और गन्धक का लेप कर शराव में रखकर तीन पुट देने से उनकी भस्म हो जाती है ॥ ५३ ॥
अन्यविधिः—
अथवा मारितं ताम्रमम्लेनैकेन मर्दितम् ।
तद्गोलं सूरणस्यान्त रुद्ध्वा सर्वत्र लेपयेत् ॥ ५४ ॥
शुष्कं गजपुटे पच्यात्सर्वदोषहरं भवेत् ।
वान्तिं भ्रान्तिं विरेकं च न करोति कदाचन ॥ ५५ ॥
अथवा ताम्र भस्म को निम्बू के रस से घोट कर गोला बना लेवें पश्चात् इस गोले को सूरणकन्द के बीच में खात कर के रख दें फिर सूरण कन्द का मुख बन्दकर ऊपर कपड़मिट्टि करदें, सूख जाने पर इसको गजपुट में रखकर फूंक दे । इस विधि से की हुई ताम्रभस्म सर्व दोषों को नष्ट करती है और उसके सेवन करने से वमन, भ्रम, दस्त आदि दोष भी नहीं होते हैं ॥ ५४-५५ ॥
अथ मारणान्तरम्—
ताम्रपत्राणि सूक्ष्माणि गोमूत्रे पञ्च यामकम् ।
क्षिप्त्वा रसेन भाण्डे तद्द्विगुणं देहि गन्धकम् ॥ ५६ ॥
अम्लपर्णी प्रपिष्याथ ह्यभितो देहि ताम्रकम् ।
सम्यङ् निरुध्य भाण्डे तमग्निं ज्वालय यामकम् ॥
भस्मीभवति ताम्रं तद्यथेष्टं विनियोजयेत् ॥ ५७ ॥
ताम्र के छोटे २ पत्रों को पञ्च प्रहर तक गोमूत्र में पड़े रहने दें या पका- लेवें, पश्चात् उन्हें गोमूत्र से निकाल कर समान पारद और द्विगुण गन्धक से घोट लें, फिर चाङ्गेरी को पीसकर ताम्र के चारों ओर लेपकर गोला बनाकर किसी हण्डिका में बन्द कर दें, पश्चात् एक प्रहर तक अग्नि देकर उतार कर के भस्म हुए ताम्र का निःशङ्क औषधकार्य में प्रयोग करें ॥ ५६-५७ ॥
सोमनाथीताम्रभस्म—
शुलवतुल्येन सूतेन बलिना तत्समेन च ।
तदर्द्धांशेन तालेन शिलया च तदर्थया ॥ ५८ ॥
विधाय कज्जलीं श्लक्ष्णां भिन्नकज्जलसन्निभाम् ।
यन्त्राध्यायविनिर्दिष्टगर्भयन्त्रोदरान्तरे ॥ ५६ ॥