रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें. पञ्चमोऽध्यायः । १७३
जिस कान्त लौह में एक मुख हो वह कनिष्ठ है। दो या तीन मुखवाला मध्यम, चार और पाँच मुखोंवाला उत्तम और सर्वमुख वाला अत्यन्त उत्तम है ॥९१॥
भ्रामकादिलौहकार्यनिर्देशः—
भ्रामकं चुम्बकं चैव व्याधिनाशे प्रशस्यते ।
रसे रसायने चैव कर्षकं द्रावकं हितम् ॥ ९२ ॥
भ्रामक और चुम्बक कान्त लौह व्याधिविनाश के लिये प्रशस्त हैं तथा रसायन के लिये कर्षक और द्रावक हितकर है ॥ ९२ ॥
रसक्रमेण कान्तस्य विशेषता—
मदोन्मत्तगजः सूतः कान्तमङ्कुशमुच्यते ॥ ९३ ॥
जिस तरह मदोन्मत्त हस्ती को अङ्कुश वश में कर लेता है उसी तरह चापल्यादि मदोन्मत्त पारद के बन्धन के लिये कान्त लौह एक तरह का अङ्कुश है, अर्थात् इससे पारद का बन्धन हो जाता है ॥ ९३ ॥
कान्तलौहस्य ग्राह्याग्राह्यनिर्देशः—
क्षेत्रं ज्ञात्वा गृहीतव्यं तत्प्रयत्नेन धीमता ।
मारुताऽऽतपविक्षिप्तं वर्जयेन्नात्र संशयः ॥ ९४ ॥
बुद्धिमान को चाहिए कि उत्तम खान से प्रयत्न पूर्वक कान्त लौह को ग्रहण करे। जो लौह दूषितवायु और धूप से आक्रान्त हुआ हो उसे त्याग दें ॥ ९४ ॥
कान्तलोहलक्षणम्—
पात्रे यस्य प्रसरति जले तैलबिन्दुर्न लिप्ता
गन्धं हिङ्गु त्यजति च तथा तिक्ततां निम्बकल्कः ।
पाके दुग्धं भवति शिखराकारकं नैति भूमौ
कान्तं लौहं तदिदमुदितं लक्षणोक्तं च नान्यत् ॥ ९५ ॥
जल से भरे जिस कान्त लौह के पात्र में तैल डालने पर फैले नहीं और उसी कान्त लौह के पात्र में हींग और निम्ब के कल्क का लेप करने पर वे अपनी गन्ध और कटुता को त्याग दें और जिसके पात्र में दुग्ध के पकाने पर वह शिखराकृति हो जाय और उबल कर पात्र से बाहर पृथ्वी पर न गिरे, इन्हीं लक्षणों वाले लौह को कान्तलौह कहते हैं अन्य को नहीं ॥ ९५ ॥