भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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१७८ रसरत्नसमुच्चये—

रुद्ध्वा गजपुटे पच्यात्कषायैस्त्रैफलैः पुनः । जम्बीरैरारनालैर्वा विंशत्यंशेन हिङ्गुलम् ॥ ११६ ॥ पिष्ट्वा रुद्ध्वा पचेल्लोहं तद्द्रवैः पाचयेत्पुनः । चत्वारिंशत्पुटैरेवं कान्तं तीक्ष्णं च मुण्डकम् प्रियते नात्र सन्देहो दत्त्वा दत्तैव हिङ्गुलम् ॥ ११७ ॥

पाञ्चपल लौह के पत्रोंको स्त्री के दुग्ध में पीसे हुए पाञ्च पल हिङ्गुल से लिप्त कर शरावसम्पुट में बन्दकर गज पुट में फूंक दें, फिर काञ्जी, त्रिफलाक्वाथ और निम्बू-रस से २० तोले हिङ्गुल को घोट कर लौह पत्र पर लेपकर फूंकदे, फिर उक्त रसों में लौह को पकाना चाहिए इस तरह वार २ हिङ्गुलडालकर ४० पुट देने से कान्त, मुण्ड, तीक्ष्ण लौहों की भस्म हो जाती है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है॥११५-११७॥

अथ तीक्ष्णलौहस्य विशेषमारणम्—

अथ पूर्वोदितं तीक्ष्णं वसुभल्लकवासयोः । पुटितं पत्रतोयेन त्रिंशद्वारानि यत्नतः ॥ शोणितं जायते भस्म कृतसिन्दूरविभ्रमम् ॥ ११८ ॥

तीक्ष्ण लौह को श्वेत पुनर्नवा के रस से भावित कर तथा अडूसे के पत्रों के स्वरस या क्वाथ से भावित कर ३० पुट देने से सिन्दूर के समान लाल भस्म हो जाती है ॥ ११८ ॥

मतान्तरम्—

यद्वा तीक्ष्णदलोद्भूतं रजश्च त्रिफलाजलैः । पिष्ट्वा दत्त्वौदनं किञ्चिच्चक्रिकां प्रविधाय च ॥ ११९ ॥ शोषयित्वाऽतियत्नेन प्रपचेत्पञ्चभिः पुटैः । रक्तवर्णं हि तद्भस्म योजनीयं यथायथम् ॥ १२० ॥

अथवा लौह चूर्ण को त्रिफला क्वाथ से घोटकर कुछ भात मिलाकर टिकिया बना लें, सूख जाने पर सम्पुट में बन्द कर पुट दे दें। इस तरह पांच पुट देने से लाल वर्ण की लौह भस्म हो जाती है, उसको रोगानुसार प्रयोग करना चाहिये ॥११९-१२०॥

मतान्तरे सर्वलौहानां मारणम्—

मत्स्याक्षीगन्धवाहीकैर्लकुचद्रवपेषितैः । विलिप्य सकलं लोहं मत्स्याक्षीकल्कलेपितम् ॥ १२१ ॥

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