रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः। २११
कुण्ड बनाकर उसमें शहद, घृत, खांड और चमेली के पुष्प इन्हें मिलाकर जप का दशांश (१० हजार) मन्त्र बोलते हुए हवन करके हवन के पश्चात् कन्याओं की पूजन करनी चाहिए ॥ ३९ ॥
अथ रससिद्धयर्थं संग्रहणीयपदार्थास्तत्पूजनादिकञ्च—
कृत्वाथ प्रविशेच्छालां शुद्धां लिप्तां संवेदिकाम् ।
षट्कोणं मण्डलं तत्र सिन्दूरेण द्विहस्तकम् ॥ ४० ॥
वेदिकायां लिखेत्सम्यक् तद्बहिश्चाष्टपत्रकम् ।
कमलं चतुरस्रं च चतुर्द्वारैः सुशोभितम् ॥ ४१ ॥
कर्णिकायां न्यसेत्खलं लोहजं स्वर्णलेखितम् ।
तन्मध्ये रसराजं तु पलानां शतमात्रकम् ॥
पञ्चाशत्पञ्चविंशद्वा पूजयेद्रसलिङ्गवत् ॥ ४२ ॥
इस तरह हवन का कार्य समाप्त कर पवित्र गोर्वर से लिप्त तथा बेदी जिस में बनी हो ऐसी शुद्ध शाला में प्रवेश करे । बाद में उस वेदी के ऊपर सिन्दूर से दो हाथ लम्बा और चौड़ा तथा छ कोनों वाला एक मण्डल बनाकर के उसके बाहर आठ दलों वाला एक कमल लिखना चाहिए और उसके चारों द्वारों पर एक चौकोर मण्डल बनाना चाहिए । कमल की कर्णिका के मध्य में एक लौह का खल्व रख कर उसमें स्वर्ण के द्वारा कुछ रेखाओं के चिन्ह बनाकर उस खल्व में १०० पल या ५० पल अथवा २५ पल पारद डाल कर रसलिंग के समान ही उस पारद की पूजन करनी चाहिए ॥ ४०-४२ ॥
तत्र रसशक्तयः—
वज्रवैक्रान्तवज्राभ्रकान्तपाषाणटङ्कणम् ।
भूनागः शक्तयश्चैताः षट्कोणे पूजयेत्क्रमात् ॥ ४३ ॥
हीरक, वैक्रान्त, वज्राभ्रक, कान्त पाषाण ( चुम्बक पत्थर ) सुहागा, भूनाग ( केञ्चुए ) ये शक्तियां हैं अर्थात् रस की शक्ति को ये ६ पदार्थ बढ़ाते हैं अत इन्हें रसशक्तियां कहते हैं । इनको षट्दल कमल में यथाक्रम रख ( स्थापन ) कर इन की पूजन करनी चाहिए ॥ ४३ ॥
तत्र उपरसाः—
गन्धतालककासीसशिलाकङ्कुष्ठभूषणम् ।