रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः । २२३
इस तरह का विषाद कर फिर किसी अन्य स्थान में रस साधन का कर्म प्रारम्भ कर देता है ॥ ३६ ॥
**विमर्शः—**कुछ पुस्तकों में "हारसोनए" के स्थान में 'महारसोऽयमित्युक्त्वा, ऐसा पाठ है वह भी ठीक है, उसका अर्थ यह महारस है ऐसा कह कर उसका सेवन करें। जहां पर "सिद्धो रसः" के स्थान में "सिद्धे रसे" ऐसा पाठ है वहां का अर्थ 'रस के सिद्ध होने पर यह है। यदि कोई शङ्का करे कि रस के सिद्ध होने पर उसके विषय में विषाद क्यों किया जाता है। उत्तर—जिस तरह राम, युधिष्ठिर आदि महापुरुष शत्रुओं को मार कर भी उनके लिये विषाद करते हैं वैसे ही यहां पर भी विषाद करना असङ्गत नहीं है ॥
रससिद्धमर्त्यफलम्— रससिद्धो भवेन्मर्त्यो दाता भोक्ता न याचकः । जरामुक्तो जगत्पूज्यो दिव्यकान्तिः सदा सुखी ॥ ३७ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये रसशालाप्रकरणं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
जो पुरुष रससिद्धि प्राप्त कर लेता है वह दाता, भोक्ता, संसार का पूज्य, जरा (बुढौती) से रहित, दिव्य कान्ति से युक्त और सर्वदा सुखी रहता है और वह किसी के पास याचक बन कर मांगने नहीं जाता है अर्थात् उसके पास सब सिद्धिएं आजाती हैं ॥ ३७ ॥
इति श्रीकृष्णात्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्जवलाख्य-भाषाटीकायां रसशालानिरूपणं नाम सप्तमोऽध्यायः ।