रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२३४ : रसरत्नसमुच्चये—
अथ द्वन्द्धानम्— द्रव्ययोर्मर्दनाध्मानाद्द्वन्द्धानं परिकीर्तितम् ॥ ५० ॥ दो धातुओं को एक साथ मिलाकर फूंकने से या मर्दन करने से जो एकी करण किया जाता है उसको द्वन्द्धान् कहते हैं ॥ ५० ॥
अथ भजनी— भागाद्द्रव्याधिके क्षेपमनुवर्णंसुवर्णके द्रवैर्वा वह्निकाग्रासो भजनी वादिभिर्मता ॥ ५१ ॥ सुवर्ण आदि धातुओं को विद्रुत कर उनमें अन्य पदार्थों के मिलाने को अनुवर्ण या सुवर्णक कहते हैं और धातुओं को गर्म कर किसी द्रव पदार्थ ( स्वरस ) के द्वारा उनकी अग्नि हरण करने को भजनी कहते हैं ॥ ५१ ॥
अथ चुलका— पतङ्गीकल्कतो जाता लोहे तारे च हेमता । दिनानि कतिचित्स्थित्वा यात्यसौ चुलका मता ॥ ५२ ॥ लोह या चांदी में कुछ औषधियों के संसर्ग से जो सुवर्ण सदृश रङ्ग (हेमता) उत्पन्न हो जाता है उसको पतङ्गी कहते हैं और कुछ दिनों के पश्चात् वह हेमता नष्ट हो जाती है उस अवस्था को चुलका कहते हैं । कुछ लोगों का मत है कि पतङ्गी नामक औषधि के कल्क में तार या लोह को कुछ दिन रखने से उनमें एक तरह से सुवर्ण के समान वर्ण उत्पन्न हो जाता है इसको चुलका कहते हैं ॥ ५२ ॥
अथ पतङ्गीरागः— रञ्जिताद्धि चिराल्लोहाद्धमानाद्वा चिरकालतः । विनिर्यास स निर्दिष्टः पतङ्गीरागसंज्ञकः ॥ ५३ ॥ रञ्जित किये हुए लौह के कुछ दिन तक पड़े रहने से या उस को फूंक देने से जो सत्त्व निकलता है उसको पतङ्गीराग कहते हैं ॥ ५३ ॥
अथ आवापः— द्रुते द्रव्यान्तरक्षेपो लोहाद्ये क्रियते हि यः । स आवापः प्रतीवापस्तदेवाऽऽच्छादनं मतम् ॥ ५४ ॥ अग्नि में विद्रुत हुए लोह में जो अन्य द्रव्य का प्रक्षेप किया जाता है उसको आवाप, प्रतीवाप अथवा आच्छादन कहते हैं ॥ ५४ ॥