भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

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अष्टमोऽध्यायः। २४३

में डालते हैं इसको वेध कहते हैं, और यह वेध अनेक प्रकार का है। लेपवेध, क्षेपवेध,कुन्तवेध धूमवेध, शब्दवेध इस तरह से वेध पाँच प्रकार का होता है॥८९-९०॥

लेपवेधलक्षणम्—

लेपनं कुरुते लोहं स्वर्णं वा रजतं तथा ।
लेपवेधः स विज्ञेयः पुटमत्र च सौरकम् ॥ ९१ ॥

लोह आदि धातुओं पर वेधसामर्थ्य उत्पन्न करने वाली विशेष क्रिया से सिद्ध हुए पारद का लेप करके उस लोहादि धातु को स्वर्ण या रोप्य के रूप में परिवर्तित कर देते हैं इसी को लेपवेध कहते हैं। इस क्रिया में उस धातु पर पारद का लेप कर सौरक पुट ( सूर्य.पुट ) से उसे पकाते हैं ॥ ९१ ॥

क्षेपवेधलक्षणम्—

प्रक्षेपणं द्रते लोहे वेधः स्यात्क्षेपसंज्ञितः ॥ ९२ ॥

किसी रजत या ताम्र इत्यादि को द्रव कर के उस में पारद ( विशेषौषध मिश्रित ) को डालते हैं । इसको क्षेपवेध कहते हैं ॥ ९२ ॥

कुन्तवेधलक्षणम्—

सन्दंशधृतसूतेन द्रुतद्रव्याहतिश्च या ।
सुवर्णत्वादिकरणं कुन्तवेधः स उच्यते ॥ ९३ ॥

किसी धातु को अग्नि में द्रव करके उस द्रवित धातु में मूर्त्तिबद्ध पारद को संदशयंत्र से पकड़ कर डुबाते हैं इससे वह द्रुत धातु ( जिसमें पारद डुबाया जाता है ) सुवर्ण के समान रूप और गुणों को करने लायक हो जाती है इसी को कुन्तवेध कहते हैं ॥ ९३ ॥

धूमवेधलक्षणम्—

वह्नौ धूमायमानेऽन्तः प्रक्षिप्त रसधूमतः ।
स्वर्णाद्यापादनं लोहे धूमवेधः स उच्यते ॥ ९४ ॥

धूप से युक्त वह्नि की भट्टी पर एक कड़ाही रख देनी चाहिए, फिर इसमें पारद डाल देना चाहिए । जब कड़ाही के अन्दर रखे हुए पारद में धूआं निकलने लगे तब उस में अन्य भट्टी पर गले हुए लोह को डाल देते हैं इससे उस धातु में स्वर्ण के गुण धर्म उत्पन्न हो जाते हैं इसको धूमवेध कहते हैं ॥ ९४ ॥