भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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अष्टमोऽध्यायः । २४५

रसस्वेदसंन्यासगुणाः ।

द्वावेतौ स्वेदसंन्यासौ रसराजस्य निश्चितम् ।
गुणप्रभावजनकौ शीघ्रव्याप्तिकरौ तथा ॥ ९९ ॥

स्वेद और सन्यास इन दोनों विधियों से पारद के अन्दर गुण और देह-सिद्धिजनक प्रभाव उत्पन्न होते हैं तथा ये दोनों संस्कार पारद को शरीर में शीघ्र ही व्याप्त होने योग्य बना देते हैं ॥ ९९ ॥


अथ परिभाषाऽऽवश्यकता—

रसनिगममहाब्धेः सोमदेवः समन्तात्
स्फुटतरपरिभाषानामरत्नानि हृत्वा ।
व्यरचयदतियत्नात्तैरिमां कण्ठमालां
कलयतु भिषगग्र्यो मण्डनार्थे सभायाम् ॥ १०० ॥

सोमदेव नामक रसशास्त्र के विशेषज्ञ ने रसशास्त्र रूपी समुद्र से प्रयत्न पूर्वक समग्ररूप से अत्यन्त स्पष्टार्थ बोधक परिभाषाओं की संज्ञा रूपी रत्नों को निकालकर उनकी कण्ठमाला (अर्थात् कण्ठस्थ करने योग्य परिभाषाएं) बनाई है। इस माला को रस शास्त्र के पण्डित सभा में स्वविषय का प्रतिपादन करने के लिये धारण करें ॥ १०० ॥


अध्यायपठनफलम्—

भवेत्पठितवारोऽयमध्यायो रसवादिनाम् ।
रसकर्माणि कुर्वाणो न स मुह्यति कुत्रचित् ॥ १०१ ॥

इति श्री वैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये
रसपरिभाषाकथनं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

रस शास्त्र के आचार्यों के मत से परिपूर्ण इस अध्याय का जो विद्वान् बार-म्बार अभ्यास (आवृत्ति) करेगा, वह रस कर्म को करता हुआ किसी विषय में व्यामोहित (किंकर्त्तव्यमूढ) नहीं होगा। अर्थात् वह किसी प्रकार से रसप्रक्रिया में भ्रमित नहीं होता है ॥ १०१ ॥

इति श्रीकृष्णआत्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां
रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकायां रसपरिभाषा-
कथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥