रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः । २४७
स्वेदनीयन्त्रम्—
साम्बुस्थालीमुखे बद्धवस्त्रे पाक्यं निवेशयेत् ।
पिधाय पच्यते यत्र स्वेदनीयन्त्रमुच्यते ॥ ५ ॥
जल अथवा अन्य ओषधियों के स्वरस से हण्डिका को भरकर उसके मुख पर एक वस्त्र बांध देते हैं, फिर उस वस्त्र के अवकाशयुक्त भाग में किसी धातु रत्न या पारद को रखकर ऊपर से सकोरे द्वारा बन्द करके अग्नि द्वारा पाक किया जाता है उसको स्वेदनी यन्त्र कहते हैं ॥ ५ ॥
अथ पातनायन्त्रम्—
अष्टाङ्गुलपरीणाहमोनाहेन दशाङ्गुलम् ।
चतुरङ्गुलकोत्सेधं तोयाधारं गलादधः ॥ ६ ॥
अधोभाण्डेमुखं तस्य भाण्डस्योपरि वर्त्तिनः ।
षोड़शाङ्गुलविस्तीर्णपृष्ठस्यास्ये प्रवेशयेत् ॥ ७ ॥
पार्श्वयोर्माहिषीक्षीरचूर्णमण्डूरफाणितैः ।
लिप्त्वा विशोषयेत्सन्धि जलधारे जलं क्षिपेत् ।
चुल्ल्यामारोपयेदेतत्पातनायन्त्रमुच्यते ॥ ८ ॥
आठ अङ्गुल चौड़ा ( विस्तृत ), दस अङ्गुल ऊंचा ( लम्बाई में ) और चार अङ्गुल मोटा ( स्थूल ) एक मिट्टी का भाण्ड लेकर उसको जल से भर दें, फिर इस जल से भरे नीचे के भाण्ड के मुख को गर्दन ( किनारे ) तक एक दूसरे १६ अङ्गुल चौड़ो पीठ ( पृष्ठभाग ) वाले ( जिसके भीतर की तली में निम्बू के रस में घोटे हुए हिङ्गुल का लेप सन्धिबन्धन करने के पहिले किया जा चुका हो ) ऊपर के मिट्टी के भाण्ड के मुख में प्रविष्ट कर देना चाहिए । फिर ( उन दोनों भाण्डों के मुखों को परस्पर मिलादेने से डमरू के समान रचना हो जाती है ) उन दोनों की मुखसन्धि को अगल बगल चारों तरफ भैंस के दुग्ध में चूने की बुकनी, मण्डूर की बुकनी और फाणित ( गुड़ की विकृति राब ) को घोट कर उससे लेप कर के सुखा देवे । फिर इस को चूल्हे पर चढ़ाकर अग्नि जला देनी चाहिए । ऊपर के भाण्ड की पीठपर एक जलाधार ( आलवाल ) या थाला ( उड़दी के ओर से ) बनाकर ठण्डाजल भरना चाहिए । ५ मिनिट बाद प्रथम गर्म हुए जलको निकाल कर दूसरा ठण्डा जल भरना चाहिए । यदि आलवाल न बना सके तो एक बा-