भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

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२६८ रसरत्नसमुच्चये—

गारा (तालाब मृत्तिका) इन सब के द्वारा बनाई हुई मूषा को वरमूषा कहते हैं। यह एक प्रहर तक अग्नि को सहन कर सकती है ॥ १५ ॥

अथ वर्णमूषा—

पाषाणरहिता रक्ता रक्तवर्गानुसाधिता ।
मृत्त्या साधिता मूषा क्षितिखेचरलेपिता ॥
वर्णमूषेति सा प्रोक्ता वर्णोत्कर्षे नियुज्यते ॥ १६ ॥

कंकड़ और पत्थर से रहित तथा रक्तवर्ग की औषधियों (कुसुम्भपुष्प, कत्था, लाक्षा, मजीठ इत्यादि) के स्वरस या क्वाथ से घोटी हुई लाल रंग की मृत्तिका से एक मूषा बना कर उसको इन्द्रगोप (वीरबहूटी) अथवा भूनागसत्त्व या काशीश के चूर्ण से लिप्त कर देनी चाहिए। इसको वर्णमूषा कहते हैं। इस मूषा के अन्दर पारद या अन्य लोहादिकों की भस्म करने से उस भस्म का उत्कृष्ट वर्ण हो जाता है ॥ १६ ॥

अथ रौप्यमूषा—

पाषाणरहिता श्वेता श्वेतवर्गानुसाधिता ।
मृत्त्या साधिता मूषा क्षितिखेचरलेपिता ॥
रौप्यमूषेति सा प्रोक्ता वर्णोत्कर्षे नियुज्यते ॥ १७ ॥

पाषाण से रहित और श्वेतवर्ग की औषधियों (तगर, कुड़े की छाल, चमेली, श्वेतगुञ्जा इत्यादि वर्गोक्त) के स्वरस या क्वाथ से घोटी हुई श्वेत मिट्टी की मूषा बना कर उसको क्षितिखेचर के चूर्ण से लिप्त कर देनी चाहिए। यह रौप्यमूषा है। इसके अन्दर चांदी आदि की सिद्ध की हुई भस्म अत्यन्त श्वेत होती है ॥ १७ ॥

अथ विड्मूषा—

तत्तद्भेदामृदोद्भूता तत्तद्विड्विलेपिता ।
देहलोहार्थयोगार्थं विड्मूषेत्युदाहृता ॥ १८ ॥

भिन्न २ प्रकार की मूषोपयोगी मृत्तिका से मूषा बनाकर उसको क्षार, अम्ल या गन्धक, लवण इत्यादि भिन्न २ प्रकार के विड़पदार्थों से लिप्त कर देना चाहिए। इस को विड़मूषा कहते हैं। इसका देह को लोह के समान दृढ करने वाले पारद या लोह आदि पदार्थों को सिद्ध करने के लिये उपयोग होता है ॥ १८ ॥

अथ वज्रद्रावणमूषा—

गारभूनागधौताभ्यां तुषमृष्टशणेन च ।