रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः । २७१
पर छिद्र न रह जाय) बन्द करके कपड़मिट्टी कर देनी चाहिए । इसको गोलमूषा कहते हैं । यह मूषा अग्नि में उड़ने लायक द्रव हुए पदार्थों को बाहर नहीं उड़ने देती है । अथवा द्रव्यों को शीघ्र ही निर्मल कर देती ॥ २८ ॥
अथ महामूषा—
तले या कूर्पराकारा क्रमादुपरि विस्तृता ।
स्थूलवृन्ताकवत्स्थूला महामूषेत्यसौ स्मृता ।
सा चायोऽभ्रकसत्त्वादेः पुटाय द्रावणाय च ॥ २९ ॥
जो मूषा तल भाग में कूर्परसन्धि ( एल्बो ज्वाइण्ट ) के समान पतली हो तथा क्रम से ऊपर को विस्तृत ( चौड़ी ) होती जाय और बैंगन के समान मोटी ( प्राय मध्य भाग में ) हो उसको महामूषा कहते हैं। यह मूषा लोह, अभ्रक, इत्यादि धातुओं के सत्त्व को पिघलाने तथा पुट देने के लिये उत्तम होती है ॥२९॥
अथ मण्डूकमूषा—
मण्डूकाकारमूषा या निम्नताऽऽयामविस्तरा ।
षडङ्गुलप्रमाणे मूषा मण्डूकसंज्ञिका ।
भूमौ निखन्य तां मूषां दद्यात्पुटमथोपरि ॥ ३० ॥
जो मूषा मेंढक के आकार के समान बीच में चौड़ी और दोनों भागों पर पतली हो तथा जिसकी लम्बाई और चौड़ाई ६ अंगुल हो ऐसी मूषा को मण्डूक मूषा कहते हैं। इस मूषा के अन्दर द्रव्य भर कर पृथ्वी में एक बिलस्त गहरी इसको गाड़ करके उसके ऊपर उपलों से पुट देवे ॥ ३० ॥
अथ मुसलाख्यमूषा—
मूषा या चिपिटा मूले वर्तुलाऽष्टाङ्गुलोच्छ्रया ।
मूषा सा मुसलाख्या स्याच्चक्रिवद्धरसे हिता ॥ ३१ ॥
जो मूषा तल भाग में चपटी तथा ऊपर की ओर गोल स्वरूपवाली तथा ८ अंगुल ऊंची हो उसको मूसलाख्यमूषा कहते हैं। यह मूषा आगे स्त्री रोगाधिकार में कथित चक्रिबद्व रस के बनाने में हितकर होती है ॥ ३१ ॥
अथ कोष्ठिकानिर्देशः—
सत्त्वानां पातनार्थाय पातितानां विशुद्धये ।
कोष्ठिका विविधाकारास्तासां लक्षणमुच्यते ॥ ३२ ॥