रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
DevanagariHindipublished362 पृष्ठ
पृष्ठ 59, कुल 362 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 59
[ ४१ ]
| विषया: | पृष्ठाङ्का: | विषया: | पृष्ठाङ्का: |
|---|---|---|---|
| जाड्ये | ” | निषिद्धद्रव्यव्यवहारजदोषे प्रतीकार: | १०६४ |
| व्रणे | ” | नागवज्रयुक्तरससेवनेप्रतीकार: | ” |
| ग्रन्थौ मसूरिकायाञ्च | ” | ग्रन्थस्योपसंहार: | १०६५ |
| सिध्मादौ | ” | औषधीनां गुणदोषकरणे कारणम् | ” |
| अस्थिस्रावे | १०५८ | औषधसेवनविधि: | १०६६ |
| विषे | ” | आचाररसायनम् | ” |
| विषे प्रयोगान्तरम् | १०५९ | आयुर्वेदोपदेशस्यावश्यपालनीयोक्ति: | १०६७ |
| सर्पविषे | ” | कुवैद्यवर्जनोपदेश: | ” |
| सर्पविषे पिशाचाद्यञ्जनम् | ” | शास्त्रज्ञवैद्यस्य साफल्योक्ति: | १०६८ |
| उन्दुरुविषे | ” | चिकित्साया: सर्वत्रसाफल्यतोक्ति: | ” |
| वृश्चिकविषे | १०६० | चिकित्साकर्मणि प्रमादेदोषा: | ” |
| विषदिग्धव्रणे | ” | चिकित्साकर्तव्यावधि: | १०६९ |
| रसायने रसकल्प: | ” | वैद्यातुरयोरन्योन्यकर्तव्य: | ” |
| अन्योरसकल्प: | ” | वैद्यस्य सर्वत्रावश्यकता | ” |
| पञ्चप्रकारेणकल्पान्तरम् | १०६०-१०६२ | पुरावृत्तद्वारा वैद्यस्य सर्वत्र सर्वपूज्यत्वप्रतिपादनम् | ” |
| बाजीकरणे मदनवर्धनाख्यो रसकल्प: | ” | ग्रन्थकर्तुर्विज्ञप्ति: | १०७१ |
| वाजीकरणे | ” | ||
| रसप्रयोगे उपचारविधि: | १०६३ | ||
| रससेवनेऽपथ्यानि | ” | ||
| निषिद्धव्यवहारे दोष: | १०६४ |