रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें⥤ भूमिका ⥢
वर्तमान् समय में पृथ्वीमण्डल पर अनेक चिकित्सा प्रणालियां प्रचलित हैं जैसे आयुर्वेद, एलोपेथी, होमियोपेथी, यूनानी, जलचिकित्सा ( हाइड्रोपेथी ), विद्युच्चिकित्सा आदि। इन सब चिकित्साओं की जननी कहलाने का सौभाग्य आयुर्वेदचिकित्सा प्रणाली को ही प्राप्त है, अथवा यों कह सकते हैं कि इन सब का अन्तर्भाव आयुर्वेद के अन्दर ही हो सकता है। जो लोग एलोपेथी ही को वैज्ञानिक कह कर अन्य चिकित्सा को अवैज्ञानिक कहने का साहस करते हैं उनकी धारणा एक दम असत्य है क्योंकि एलोपेथी के अन्दर जितने भी विषय ( Anotomy, Physiology, Surgery, Toxicology, Jurisprudence, Midwifery, Materiamedica, Medicine etc., ) हैं उन सबका वर्णन आयुर्वेद के अन्दर करोड़ों वर्ष पहिले से लिखा हुआ मिलता है। इस लिए हम दावे के साथ कह सकते हैं कि संसार भर की चिकित्साप्रणालियों में सर्वप्रथम तथा सर्वश्रेष्ठ यदि कोई चिकित्सा प्रणाली है तो वह आयुर्वेदचिकित्सा प्रणाली ही है। हमारे आयुर्वेद के अन्दर इस समय कोई शाखा पिछड़ी हुई है तो वह सिर्फ शल्यशालाक्य चिकित्सा ही है। इसका कारण इस शाखा को प्रोत्साहन नहीं मिलना है तथा वैद्यबन्धुओं का आलस्य और आधुनिक भूपालों की उपेक्षा आदि है। अब इसकी सर्वोत्कृष्ट उन्नति होने का समय अत्यन्त निकट ही है। अस्तु आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली आसुरी, मानुषी और दैवी इस तरह तीन भागों में विभक्त है जैसे कहा भी है—
सा दैवी प्रथमा सुसंस्कृतरसैर्या निर्मिता सद्रसै-
श्चूर्णस्नेहकषायलेहरचिता स्यान्मानवी मध्यमा।
शस्त्रच्छेदनलास्यलक्ष्मणकृताऽचाराधमा साऽऽसुरी-
त्यायुर्वेदरहस्यमेतदखिलं तिस्रश्चिकित्सा मताः ॥ १ ॥
आसुरी मानुषी दैवी चिकित्सा त्रिविधा मता।
शस्त्रैः कषायैर्लोहाद्यैः क्रमेणान्त्याः सुपूजिताः ॥ २ ॥