भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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रसरत्नसमुच्चये—

मनुष्यों के पूर्व जन्म के पापों से उत्पन्न होने वाले रोग समूह जड़ से नष्ट हो जाते हैं इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। पारे का गन्धक के साथ पेषण करके शिवलिंग पर चन्दन के समान लेपन करने से मनुष्यों के पूर्व देह कृत पाप तुरन्त नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य अभ्रक तथा किञ्चिन्मात्र भी पारद का अच्छी तरह जारण करता है उसको शत अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है, ऐसा शिव जी ने कहा है।

जारणलक्षणं यथा— सूते गन्धादिनिक्षेपात्तत्तद्विधिविशेषतः ।
गन्धाद्यं जीर्यते यत्तु जारणं कथ्यते बुधैः ॥

जो मनुष्य परमोत्कृष्ट महादेव के तेज स्वरूप पारद की निन्दा करता है वह कल्पान्त तक नरक में पड़ा रहता है ॥ २२—२८ ॥

अथ पारदस्य विशेषतो महत्ता—

रोगिभ्यो यो रसं दत्ते शुद्धिपाकसमन्वितम् ।
तुलादानाश्र्वमेधानां फलं प्राप्नोति शाश्वतम् ॥ २९ ॥
सिद्धे रसे करिष्यामि निर्दारिद्र्यगदं जगत् ।
रसध्यानामदं प्रोक्तं ब्रह्महत्यादिपापनुत् ॥ ३० ॥
अभ्रग्रासो हि सूतस्य नैवेद्यं परिकीर्तितम् ।
रसस्येत्यर्चनं कृत्वा प्राप्नुयात्क्रतुजं फलम् ॥ ३१ ॥
उदरे संस्थिते सूते यस्योत्क्रामति जीवितम् ।
स मुक्तो दुष्कृताद्घोरातप्रयाति परं पदम् ॥ ३२ ॥

जो वैद्य सम्पूर्ण शुद्धि करके पारद की भस्म या उसका पाक करके रोगियों को औषध रूप में देता है उसको तुलादान तथा अश्वमेध यज्ञ करने का अनश्वर फल प्राप्त होता है। पारद का भस्मादि रूप में सिद्ध होने पर संसार को दारिद्र्य और रोग से मुक्त कर दूंगा इस तरह से किया हुआ पारद का ध्यान ब्रह्महत्यादि अनेक पापों का नाश करता है। पारद में अभ्रक को लीन करने के लिये जो जारण कर्म होता है उस पारद को अभ्रग्रास कहते हैं, इस तरह अभ्रक का ग्रास करना ही पारद का नैवेद्य है पारद की पूजा में भी अभ्रक रक्खा जाता है इस तरह पारद की जो पूजन करता है वह यज्ञजन्य फल को प्राप्त करता है।


(पार्श्व/पाद हस्तलिखित टिप्पणियाँ)

  • वाम पार्श्व: सिद्धे भो. लोड, जले पिक्त्वा ॥ गुटिका धारणं परा सदा ॥
  • अधोभाग: रसस्य गुटिकां बद्ध्वा कण्ठे चैव तु धारणम् ॥
    सर्व रोगाणि नश्यन्ति नरस्य नात्र संशयः ॥