भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ७४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । नागा ( सिक्का ) वंग ( कली ) शोधन । नागवङ्गे च गलिते रविदुग्धेन सेचिते । त्रिवाराच्छुद्धिमायांतः सच्छिद्रे हण्डिकांतरे॥ ८९ ॥ एक हाण्डीमें आकका दूध डालकर उस हाण्डीके मुखपर छिद्रयुक्त शराव ढक दे, फिर नाग या वंग जो शोधन करना हो उसको पिघ- लाकर उस छिद्रवाले शरावमें डाले जिससे यह पिघला हुआ धातु छिद्रद्वारा हाण्डीमें गिरकर आकके दूधमें डूब जावे, इस प्रकार तीन बार पिघला २ कर बुझानेसे नाग और वंग शुद्ध हो जाते हैं ॥ ८९ ॥ वङ्गं चूर्णोदके स्विन्नं यामार्डेन विशुद्ध्यति॥२९०॥ अन्य प्रकार-वंग ( कली ) के बारीक बारीक पत्रोंको छोटे छोटे बना पोटली बांध दोलायंत्रद्वारा चूनेके पानीमें चार घडी पकावे तो वंग शुद्ध हो जाती है ॥ २९० ॥ इति नाग-वंग-शोधन । नाग ( सिक्का ) मारण । भुजंगममगस्त्यं च पिष्ट्वा पत्रं प्रलेपयेत् । तत्र संविद्रुते नागे वासापामार्गसंभवम् ॥ ९१ ॥ क्षारं विमिश्रयेत्तत्र चतुर्थांशं गुरूक्तितः । प्रहरं पाचयेच्चुल्ल्यां वासादर्या च चालयेत् ॥९२॥ तत उद्धृत्य तच्चूर्णं वासानीरेण मर्दयेत् । एवं सप्तपुटैर्नागं सिन्दूरं जायते ध्रुवम् ॥ ९३ ॥ सीसे ( सिक्के ) के बारीक पत्रोंपर अगस्तिये वृक्षके फूलों ( और नागरवेलके पत्रों ) को रगड़कर लेप करे, फिर इन पत्रोंको मट्टीके तौले ( कटाहका पात्र ) में डाल चूलहे पर चढ़ा नीचे अग्निको जलावे, जब सीसा पिघल जाये तो वांसे और अपामार्गका क्षार सीसेके तोलसे चौथा भाग ले थोडा थोडा बुरकाता जाये और वांसा ( अडूसे ) की