भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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अथोत्तरखण्डः । क्षीराब्धेरुत्थितं देवं पीतवस्त्रं चतुर्भुजम् । वन्दे धन्वन्तरिं भक्त्या नानागदनिषूदनम् ॥ १ ॥ जो क्षीर समुद्रके मथनेके समय पीत वस्त्रोंको धारण किये हुए चतुर्भुज भगवान् प्रगट हुए और जो नाना रोगोंके नाश करनेवाले देव हैं उन धन्वन्तरि भगवान्‌को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूं ॥ १ ॥ प्रायशो वपुषः शुद्धिं कृत्वा देयं तदौषधम् । अतः पूर्वं चिकित्सायां रेचकौषधमुच्यते ॥ २ ॥ प्रायः संपूर्ण रोगोंमें शरीरको शुद्ध करके तदनंतर औषधि देना चाहिये । इसलिये संपूर्ण औषधियोंसे पहले रेचनी औषधियोंको कथन करते हैं ॥ २ ॥ इच्छाभेदी रस । तुल्यं टङ्कणपारदं समरिचं तुल्यांशकं गन्धकं विश्वा च द्विगुणा ततो नवगुणं जैपालचूर्णं क्षिपेत् । गुञ्जैकप्रमितो रसो हिमजलैः संसेवितो रेचयेत् यावन्नोष्णजलं पिबेदपि वरं पथ्यञ्च दध्योदनम्॥३॥ शुद्ध सुहागा, शुद्ध पारा, कालीमिर्च और शुद्ध गंधक यह सब एक एक भाग लेवे । सोंठ दो भाग, शुद्ध जमालमोटा ९ भाग इन सबको खरल करके शीशीमें रक्खे इसमेंसे एक रत्ती प्रमाण प्रातःकाल खाकर ऊपरसे शीतल जल पीवे तो उत्तम रीतिसे रेचन ( दस्त ) होजाता है । जबतक गरम जल न पीवे तबतक रेचन होता रहता है । ठीक रेचन हो लेनेके अनंतर दहीभातका पथ्य खिलावे ॥ ३ ॥