भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

भाषाटीकासहित । ( १२७ ) सव्योषमर्कदुग्धेन दिनं संमर्दयेद्दृढम् । अर्कक्षीरयुतं नस्यं सन्निपातहरं परम् ॥ ९२ ॥ पारद भस्म या रससिन्दूर, तांबेकी भस्म, तीक्ष्णलोह भस्म, चीतेकी जड़, सुहागा, खपरिया और त्रिकुटा यह सब औषधि समान भाग लेकर आकके दूधमें एक दिन खरल करके गोली बनावे । फिर इन गोलियोंको आकके दूधमें भावना देकर नस्य ग्रहण करे तो सन्नि- पातज्वर नष्ट होता है ॥ ९२ ॥ अंजन भैरव । सूततीक्ष्णकणागन्धमेकांशं जयपालकम् । सर्वैस्त्रिगुणितं जम्बुवारिणा च सुपेषितम् ॥ नेत्राञ्जनेन हन्त्याशु सर्वोपद्रवमुद्धतम् ॥ ९३ ॥ पारा, तीक्ष्णलोह भस्म, पीपल और गंधक यह सब औषधि एक एक भाग और जमालगोटे सबसे तिगुने लेवे, इन सबको एकत्र करके जामुनके रसमें खरल करके नेत्रोंमें आंजनेसे सन्निपातज्वर और अत्यंत वृद्धिको प्राप्त हुए सन्निपातके उपद्रव दूर होते हैं ॥ ९३ ॥ गन्धेशं लशुनाम्भोभिर्मर्दयेद्याममात्रकम् । तस्योदकेन संयुक्तं नस्यं तत्प्रतिबोधकृत् । मरिचेन समायुक्तं हन्ति तन्द्राप्रलापकान् ॥ ९४ ॥ गंधक १ भाग और पारा १ भाग इन दोनोंकों एकत्र खरल करके कज्जली बनावे । फिर लहसुनके रसमें एक प्रहर खरल करे । फिर इसको लहसुनके रसमें मिलाकर नस्य देनेसे संज्ञा रहित सन्निपात रोगी भी संज्ञाको प्राप्त होता है । काली मिर्चोंके साथ इस औषधिकी नस्य देनेसे तन्द्रा और प्रलाप दूर होते हैं । इसे अंजनरस कहते हैं॥९४