रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (२०५) भृङ्गाऽब्दकेशराजैश्च तथा चेन्द्राशनोत्कटैः । सर्पपाभां वटीं कृत्वा दद्यात्तां ग्रहणीगदे ॥ सामवातेऽग्निमांद्ये च ज्वरे प्लीहोदरेषु च ॥ ५२ ॥ वातश्लेष्मविकारेषु तथा श्लेष्मगदेषु च । अम्तक्रादिसेवाञ्च कुर्वीत स्वेच्छया बहु ॥ ५३ ॥ श्रीमता वैद्यनाथेन लोकानुग्रहकारिणा । स्वप्नान्ते ब्राह्मणस्येयं भाषिता लिखितेन तु ॥ ५४ ॥ पारा चार मासे लेकर कांजीमें शुद्ध करे, पश्चात् चित्रकके रसमें फिर त्रिफलेके रसमें भावना देकर शुद्ध करे और फिर पारेसे आधा भाग शुद्ध गंधक लेवे, फिर इन दोनोंको भांगरेके चार मासे रसमें खरल करके मूर्च्छित करे । फिर निर्गुण्डी, मुलैठी, अपराजिता, सफेद वनतुलसी, ग्रीष्मसुन्दर, भांगरा, नागरमोथा, कुकुरभांगरा और भांग इन प्रत्येकके रसमें अलग अलग भावना देकर सरसोंकी बरा- बर गोली बनावे । इन गोलियोंका ग्रहणी रोग, आमवात, मंदाग्नि, ज्वर, प्लीहोदर, वातकफके रोग, कफके रोग और समस्त अग्निके रोगोंमें विधिपूर्वक सेवन करे । इसपर खटाई और तक्र यथेच्छानुसार सेवन करे । श्रीमान् वैद्यनाथने संसारके ऊपर अनुग्रह करके यह किसी ब्राह्मणको स्वप्नमें कही है और लिखित ऋषिने भाषण की है॥४९-५४॥ रसपर्पटिका । याम्लपित्ते विधातव्या गुटिका च क्षुधावती । तत्र प्रोक्तविधा शुद्धौ समानौ रसगन्धकौ ॥ ५५ ॥ संमर्द्य कज्जलाभन्तु कुर्यात्पात्रे दृढाश्रये । ततो बादरवह्निस्थे लौहपात्रे द्रवीकृतम् ॥ ५६ ॥ गोमयोपरि विन्यस्त-कदलीपत्रपातनात् । कुर्यात्पर्पटिकाकारमस्य रक्तिद्वयं क्रमात् ॥ ५७ ॥ ८