रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वराटिकाप्रमाणेन भक्षणीयो विशेषतः । क्रिमिरोगविनाशाय रसोऽयं क्रिमिनाशनः ॥ १० ॥ पारा, गन्ध, लोहाभस्म, कालीमिरच, विष, धायके फूल, हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, नागरमोथा, रसौंत, त्रिकुटा, मोथा,पाठ,सुगंध- वाला और बेलगिरी इन सबको एकत्र खरल करके भांगरेके रसकी सात भावना देवे । फिर इसमेंसे एक कौड़ीभर सेवन करनेसे क्रिमिरोग नष्ट होता है । इसको क्रिमिरोगारि रस कहते हैं ॥ ८-१० ॥ कीटमर्द रस । शुद्धसूतं शुद्धगन्धमजमोदाविडङ्गकम् । विषमुष्टि ब्रह्मबीजं क्रमाद्द्विगुणितं भवेत् ॥ ११ ॥ चूर्णयेन्मधुना मिश्रं निष्कैकं क्रिमिजिद्भवेत् । कीटमर्दो रसो नाम मुस्ताक्वाथं पिबेदनु ॥१२॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग, अजमोद ४ भाग,वायविडंग ८ भाग, कुचला १६ भाग और ढाकके बीज ३२ भाग, इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर प्रतिदिन इसमेंसे चार मासे परिमाण शहतमें मिलाकर सेवन करे तो क्रिमिरोग नष्ट होता है । इसके ऊपर नागरमोथेका क्वाथ पान करे । इसको कीटमर्द रस कहते हैं ॥ ११ ॥ १२ ॥ क्रिमिघ्न रस । क्रिमिघ्नं किंशुकारिष्टबीजं सुरसभस्मकम् । वल्लद्वयं चाखुकर्णीरसैः क्रिमिविनाशनः ॥ १३ ॥ वायविडंग, ढाकके बीज, नीमके बीज और तुलसीके पत्तोंकी भस्म इन सबको समान भाग लेकर चूर्ण कर ले । फिर इस चूर्णमेंसे चार रत्ती परिमाण लेकर मूसाकानीके रसके साथ पान करनेसे क्रिमिरोग नष्ट होता है । इसको क्रिमिघ्न रस कहते हैं ॥ १३ ॥