रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पथ्यं मृगांकवद्देयं शयीतोत्तानपादतः ॥ २३ ॥ ये शुष्का विषमाशनैः क्षयरुजा व्याप्ताश्च येऽष्ठी- लया, पाण्डुत्वेन हताश्च वैद्यविधिना ये त्याजिता दुर्भागाः । ये तप्ता विविधैर्ज्वरैः श्रममदोन्मादैः प्रमादं गता,–स्ते सर्वे विगतामया हतरुजः स्युः पोट्टलीसेवनात् ॥ २४ ॥ इस औषधिके सेवन करनेपर लवणका भक्षण करना त्याग देवे । घृत और दधि अवश्य भक्षण करना चाहिये । इसको २१ दिन तक खाये और घी तथा मरिचोंके चूर्णका सेवन करे । मृगाङ्कके समान पथ्य देवे और ऊपरको पैर करके अर्थात् चित्त शयन करे । जो मनुष्य विषम भोजन करनेसे शुष्क हो गये हैं, जिनके क्षय रोग, अष्ठीला और पांडु रोग है, जिनको अत्यंत दारुण रोगोंसे पीड़ित होनेके कारण वैद्योंने त्याग दिया है, जो अनेक प्रकारके ज्वरोंसे संतप्त हैं, तथा जो श्रम और उन्मादरोगसे पीडित हैं उनको यह औषधि अवश्य सेवन करानी चाहिये । इससे शीघ्र ही उपरोक्त रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ २२–२४ ॥ कनकसुन्दर रस । रसस्य तुर्यभागेन हेमभस्म प्रयोजयेत् । मनःशिला गन्धकञ्च तुत्थं माक्षिकतालकम् ॥२५॥ विषं टङ्कणं सर्वं रसतुल्यं प्रदापयेत् । मर्दयेत्सर्वमेकत्र खल्लपात्रे च निर्मले ॥ २६ ॥ जयन्तीभृंगराजोत्थैः पाठाया वासकस्य च । अगस्तिलांगलाग्नीनां स्वरसैश्च पृथक् पृथक् ॥२७॥ भावयित्वा विशोष्याथ पुनश्चार्द्रकवारिणा । सप्तधा भावयित्वा च रसः कनकसुन्दरः ॥२८॥