रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (४०९) औषधिके सेवन करनेसे अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात, प्रमेह और विषमज्वर नष्ट होकर बल, पुष्टि, वीर्य और आयुकी वृद्धि होती है । यह वरुणाद्य लोह चरकाचार्यने कहा है ॥ ३-६ ॥ अयोरजः श्लक्ष्णपिष्टं मधुना सह योजयेत् । मूत्राघातं निहन्त्याशु मूत्रकृच्छ्रं सुदारुणम् ॥ ७ ॥ लोहभस्मके चूर्णको अत्यन्त बारीक पीसकर सहतमें मिलाकर सेवन करनेसे मूत्राघात और दारुण मूत्रकृच्छ्र रोग दूर होते हैं ॥ ७ ॥ रसगन्धयवक्षारं सितातक्रयुतं पिबेत् । मूत्रकृच्छ्रान्यशेषाणि निहन्ति नियतं नृणाम् ॥ ८ ॥ पारा और गन्धक, दोनोंको समान भाग लेकर कज्जली बना लेवे । फिर उसमें पारेकी बराबर जवाखार मिलाकर मिश्री और तक्रके साथ सेवन करे तो अनेक प्रकारका मूत्रकृच्छ्र रोग नष्ट होता है ॥ ८ ॥ भैषज्यैरश्मरीप्रोक्तैर्मूत्रकृच्छ्रमुपाचरेत् । योगवाहिरसैर्वापि चानुपानविशेषतः ॥ ९ ॥ अश्मरी रोगमें जो औषधि कही है वह सब औषधि इस मूत्रकृच्छ्र रोगमें भी प्रयुक्त करनी चाहिये । अथवा समस्त योगवाही रसोंको अनुपान विशेषोंके साथ सेवन करावे ॥ ९ ॥ मूत्रकृच्छ्रान्तक रस । शतावरीरसैः पिष्ट्वा मृतसूतञ्च तालकम् । शिखितुत्थञ्च तुल्यांशं दिनैकं मर्दयेद्दृढम् ॥ १० ॥ तद्गोलं सार्षपे तैले पाच्यं यामञ्च चूर्णयेत् । मूत्रकृच्छ्रान्तकश्चास्य क्षौद्रैर्गुञ्जाचतुष्टयम् ॥ ११ ॥ भक्षणान्नात्र सन्देहो मूत्रकृच्छ्रं निहन्त्यलम् ।