रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (४११) लघुलोकेश्वर रस । शुद्धसूतस्य भागैकश्चत्वारः शुद्धगन्धकात् । पिष्ट्वा वराटिका पूर्या रसपादेन टंकणम् ॥ ३ ॥ क्षीरैः पिष्ट्वा मुखं लिप्त्वा भाण्डे रुद्ध्वा पुटे पचेत् । स्वाङ्गशीतं विचूर्ण्याथ लघुलोकेश्वरो मतः ॥ ४ ॥ चतुर्गुआप्रमाणन्तु मरिचेन तथैव च । जातीमूलफलैर्युक्तमजाक्षीरेण पाययेत् ॥ शर्कराभावितञ्चानु पीत्वा कृच्छ्रहरः परः ॥ ५ ॥ शुद्ध पारा १ भाग और शुद्ध गन्धक ४ भाग लेवे, दोनोंको एकत्र खरल करके कौड़ीमें भर देवे, फिर पारेसे चौथाई भाग सुहागा लेकर दूधमें पीसकर उससे कौड़ीके मुखको बन्द कर देवे । फिर उस कौड़ीको मूषामें रखकर और उसको अच्छे प्रकारसे कपरमिट्टीसे बन्द करके पुटपाकसे पकावे । जब शीतल होजाय तब इसका चूर्ण करके चार रत्ती परिमाण लेकर चार रत्ती काली मिरचोंका चूर्ण, चार रत्ती चमेलीकी जड़का चूर्ण और चार रत्ती जायफलका चूर्ण इन सबको एकत्र करके बकरीके दूध और मिश्रीके साथ पान करे तो मूत्रकृच्छ्र रोग दूर होता है । इसको लघुलोकेश्वर रस कहते हैं ॥ ३-५ ॥ अन्य योग । येनौषधेन मतिमान्मूत्रकृच्छ्रमुपाचरेत् । तेनौषधेन श्रेष्ठेन मूत्राघातानुपाचरेत् ॥ ६ ॥ जो औषधि मूत्रकृच्छ्र रोगकी कही हैं वे सब औषधि मूत्राघात रोगमें भी प्रयुक्त करनी चाहिये ॥ ६ ॥ लवणाम्लवरायुक्तं घृतञ्चापि पिबेन्नरः । तस्य नश्यन्ति वेगेन मूत्राघातास्त्रयोदश ॥ ७ ॥