रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 502, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४७६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । और काला जीरा डालकर गिलोयका क्वाथ, घृतमिश्रित मूंगका यूष और रोहिड़ेकी जड़के क्वाथको पीवे । चौदह दिनतक इस औषधिके सेवन करनेसे कुष्ठरोग नष्ट होता है । अत्यन्त क्षुधा लगती है और शरीर अत्यन्त सुन्दर हो जाता है । इसपर कुष्ठरोगी सदैव मछली और मांस आदिके भोजनको त्याग देवे ॥ ४८-५१ ॥ कुष्ठहारितालेश्वर रस । हरितालं भवेद्भागं द्वादशात्र विशुद्धिमत् । गन्धकोऽपि तथा ग्राह्यो रसः सप्तात्र दीयते ॥ ५२ ॥ कृष्णाभ्रकमपि श्लक्ष्णं खल्ले कृत्वा विमर्दयेत् । अंकोलमूलनीरेण सेहुण्डीपयसाथवा ॥ ५३ ॥ अर्कदुग्धेन संपिष्य करवीरजलेन च ॥ काठोदुम्बरनीरेण पेषणीयो रसो भृशम् ॥ ५४ ॥ शुद्धताम्रकटोरे च क्षेपणीयो रसेश्वरः । पञ्चगुञ्जाप्रमाणेन काठोदुम्बरवारिणा ॥ ५५ ॥ कुष्ठाष्टादशसंख्येषु देय एष भिषग्वरैः । अचिरेणैव कालेन विनाशं यान्ति निश्चयात् ५६॥ पथ्यसेवा विधातव्या प्रणतिः सूर्यपादयोः । साधकेन तथा सेव्यो रसो रोगौघनाशनः ॥ पिप्पलीभिः समं दद्यात्कुष्ठरोगे रसेश्वरम् ॥ ५७ ॥ शुद्ध हरिताल १२ भाग, गन्धक १२ भाग, शुद्ध पारा ७ भाग और कृष्णाभ्रकभस्म ७ भाग लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर अंकोलकी जड़के रस, थूहरके दूध, आकके दूध, कनेरके रस और कठूमरके रसमें अलग २ भावना देकर और अच्छे प्रकारसे खरल करके गोलासा बना लेवे । पश्चात् शुद्ध तांबेकी एक उत्तम घड़िया बनवाकर उस घड़ियामें इस गोलेको रखकर छः प्रहरतक