भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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पृष्ठ 508

( ४८२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । औषधिके ऊपर हांड़ीके भीतर एक सिकोरा ढककर राखसे हांड़ीको भर देवे; फिर दो प्रहरतक अग्निसे पकावे । जब अपने आप शीतल होजावे तो इसका चूर्ण कर लेवे । फिर आकके दूधमें इसको पीसकर पुटमें पकावे । इस प्रकार बारह बार पुट करके त्रिफला, चित्रक और भांगरेके रसमें अलग अलग तीन तीन भावना दे । यथोचित मात्रानु- सार यथोचित अनुपानके साथ इसके सेवन करनेसे वातरक्त और मण्डलकुष्ठ नष्ट होता है । इसको अर्केश्वर रस कहते हैं ॥ ७६-७८ ॥ महातालेश्वर रस । तालताप्यशिलासूतं शुद्धटङ्गणसैन्धवम् । समं संचूर्णयेत्खल्ले सूताद्विगुणगन्धकम् ॥ ७९ ॥ गन्धतुल्यं मृतं ताम्रं लौहभस्म चतुःपलम् । जंबीराम्लेन तत्सर्वं दिनं मर्द्यं पुटेल्लघु ॥ ८० ॥ त्रिंशदंशं विषञ्चात्र क्षिप्त्वा सर्वं विचूर्णयेत् । माहिषाज्येन संमिश्रं निष्कार्द्धं भक्षयेत्सदा ॥ ८१ ॥ मध्वाज्यैर्वांगुजीचूर्णं कर्षमात्रं लिहेदनु । सर्वान्कुष्ठान्निहन्त्याशु महातालेश्वरो रसः ॥ ८२ ॥ हरितालभस्म, सोनामाखीभस्म, मैनशिल, पारा, सेंधानमक और सुहागा यह प्रत्येक औषधि चार चार तोले लेवे, गन्धक ८ तोले, ताम्रभस्म ८ तोले और लोहेका चूर्ण १६ तोले लेवे । इन सब औष- धियोंको एकत्र पीसकर जम्भीरी नींबूके रसमें एक दिनतक खरल करके लघुपुटमें पकावे । पश्चात् समस्त औषधियोंका ३० तीसवां भाग विष मिलाकर सबको एकत्र पीसकर चूर्ण कर लेवे । इसमेंसे दो मासे औषधि लेकर भैंसके घीके साथ सेवन करे । इसके सेवन करनेके अन्तमें बावचीका चूर्ण १ कर्ष परिमाण लेकर सहत और घृतमें मिला- कर चाटे । इसके सेवन करनेसे सब प्रकारके कुष्ठरोग नष्ट होते हैं । इसको महातालेश्वर रस कहते हैं ॥ ७९-८२ ॥