भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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भाषाटीकासहित। ( ४८९ ) बदरीपत्रकल्केन सन्धिलेपञ्च कारयेत् । अरुणाभमधःपात्रं तावज्ज्वाला प्रदीयते ॥ ११२ ॥ स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य माणिक्याभो भवेद्रसः । तद्रक्तिद्वितयं खादेद् घृतभ्रामरमर्द्दितम् ॥११३॥ संपूज्य देवदेवेशं कुष्ठरोगाद्विमुच्यते । स्फुटितं गलितं कुष्ठं वातरक्तं भगन्दरम् ॥ ११४ ॥ नाडीव्रणं व्रणं दुष्टमुपदंशं विचर्चिकाम् । नासास्यसंभवान्रोगान्क्षतान्हन्ति सुदारुणान् ॥ पुण्डरीकं चर्मदलं विस्फोटं मण्डलं तथा ॥ ११५ ॥ इति रसेन्द्रसारसंग्रहे कुष्ठाधिकारः । वर्की हरितालको पेठेके रसमें, दहीमें और कांजीमें सात सात वार; अथवा तीन तीन वार दोलायंत्रमें पकाकर उत्तम विधिसे सुखा लेवे । फिर चावलोंके समान चूर्ण करके एक शराव सिकोरेमें रखकर उप- रसे एक दूसरे सिकोरेसे ढककर उसके जोड़ोंको अच्छे प्रकारसे बेरीके पत्तोंके कल्कसे बंद कर देवे । पश्चात् आरने उपलोंकी अग्निमें इसको पकावे । जबतक पात्रका रंग अच्छे प्रकारसे लाल न हो जाय तबतक पकावे । शीतल होनेपर इस माणिक्यकी समान औषधिको लेकर भक्तिपूर्वक महादेवकी पूजा करके दो रत्ती परिमाण औषधि सहत और घृतमें मिलाकर सेवन करे । इससे अवश्य कुष्ठरोग नष्ट होता है । इसके सेवन करनेसे फटा हुआ और गलता हुआ कुष्ठ, वातरक्त, भगन्दर, नाडीव्रण, दुष्टव्रण, उपदंश, विचर्चिका, मुख और नासिकागत दारुण क्षतरोग, पुण्डरीक, चर्मदल, विस्फोटक और मण्डलकुष्ठ नष्ट होते हैं। इसको माणिक्य रस कहते हैं॥ ११०-११५॥ इति कुष्ठाधिकार समाप्त ।