रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 564, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शरीर हो जाता है । इस औषधिके सेवन करनेसे अपुत्रा स्त्री पुत्रवती होती है । दुर्बल मनुष्य, क्षीण व्यक्ति, वृद्ध मनुष्य और वायुसे दूषित वीर्यवाले मनुष्योंको ओज और तेजको बढ़ानेवाली है । स्त्रीगमनमें इच्छा बढ़ाती है । प्रौढ़ा स्त्रीके साथ प्रसंग करनेसे वृद्ध मनुष्योंको भी कामदेवको बढ़ानेवाली है । नित्य आनन्द जनक और अतिशय सुखको देनेवाली है । इस औषधिके अभ्याससे मनुष्य मृत्यु पलित और सर्व रोगोंसे रहित हो जाता है । यह बृहत्पूर्णचन्द्ररस राजाओंके योग्य तत्काल फलप्रद और सिद्धिदायक है ॥६०-६४ ॥ चन्द्रोदय रस । पलं मृदुस्वर्णदलं रसेन्द्रात्पलाष्टकं षोडश गन्ध- कस्य । शोणैः सुकार्पासभवप्रसूनैः सर्वं विम- र्द्याथ कुमारिकाद्भिः ॥ ६५ ॥ तत्काचकुम्भे निहितं प्रगाढं मृत्कर्पटैस्तद्दिवसत्रयञ्च । पचेत् क्रमाग्नौ सिकताख्ययन्त्रे ततो रजः पद्मराग- रम्यम् ॥ ६६ ॥ संगृह्य चैतस्य पलञ्च सम्यक् पलञ्च कर्पूररजस्तथैव । जातीफलं शोषणमिन्द्र- पुष्पं कस्तूरिकाया इह शाण एकः ॥ ६७ ॥ चंद्रोदयोऽयं कथितोऽस्य वल्लो भुक्तोऽहिवल्लीदल- मध्यवर्ती।मदोन्मदानां प्रमदाशतानां गर्वाधिकत्वं श्लथयत्यकुण्ठात् ॥६८॥ घृतं घनीभूतमतीव दुग्धं मृदूनि मांसानि च मुस्तकानि । माषाणि पिष्टानि भवन्ति पथ्यान्यानन्ददायीन्यपराणि चात्र॥६९॥ कोमल सुवर्णके पत्र (वरक) ४ तोले, पारा ८ पल और गंधक १६ पल इन तीनों औषधियोंको एकत्र पीसकर लाल कपासके फूलोंके