रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३५ ) मनुष्यका शरीर वज्रके समान दृढ और नीरोग हो जाता है । हीरेकी भस्म-आयुवर्द्धक, सुखकारक, बलदायक, सुंदरताकारक, रोगनाशक और मृत्युकोभी हरनेवाली है अधिकतो क्या कहना है ॥ १३२-१३४॥ इति हीराभस्मगुण समाप्त । अथ वैक्रांतप्रकरण । वैक्रान्तं वज्रवच्छोध्यं ध्मातं तं द्वयमूत्रके । हिमं तद्भस्म संयोज्यं वज्रस्थाने विचक्षणैः ॥१३५॥ वैक्रांत मणिको भी हीरेके समानही शोधन करना चाहिये और उसी प्रकार २१ वार तपा तपा कर घोड़ेके मूत्रमें बुझानेसे वैक्रांत मणिकी भस्म होजाती है । बुद्धिमानोंको चाहिये जहां हीरेकी भस्म न मिल सके वहाँ वैक्रांतकी भस्मका प्रयोग करे ॥ १३५ ॥ वैक्रान्तं वज्रवच्छोध्यं मारणञ्चैवं तस्य तत् । हयमूत्रेण तत्सेच्यं तप्तं तप्तं त्रिसप्तधा ॥ १३६ ॥ ततश्वोत्तरवारुण्याः पञ्चांगे गोलकं क्षिपेत् । रुद्धा मूषापुटे पाच्यमुद्धृत्य गोलकं पुनः ॥१३७॥ क्षिप्त्वा रुद्धा पचेदेवं यावत्तद्भस्मतां व्रजेत् । भस्मीभूतञ्च वैक्रान्तं वज्रस्थाने नियोजयेत् ॥१३८॥ अन्य प्रकार-वैक्रांतका शोधन मारण सब हीरेके समान ही जानना । अथवा वैक्रांतको २१ वार गरम करके घोड़ेके मूत्रमें बुझावे फिर इंद्रायणके पञ्चाङ्गको पीसकर गोला बनावे इस गोलेमें वैक्रांतको रख संपुटकर मूषा पुटमें पकावे फिर निकालकर उसी प्रकार इन्द्रायणके गोलेमें संपुट कर मूषा पुटमें पकावे जबतक भस्म न हो तबतक इसी प्रकार मूषापुटमें (कोयलोंकी अग्निमें रख) पकाता रहे । भस्म होनेपर इस वैक्रांतभस्मका हीरेकी भस्मके अभावमें प्रयोग करे ॥१३६-१३८॥ इति वैक्रांत मारण ।