भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 75

भाषाटीकासहित । ( ४९ ) मनशिलके पर्याय । मनःशिला च नेपाली शिलाह्वा नागजिह्विका । मनोह्वा कुनटी गौणी करञ्जी करवीरिका ॥१९३ ॥ मनःशिला, नेपाली, शिलाह्वा, नागजिह्विका, मनोह्वा, कुनटी, गौणी, करञ्जी और करवीरिका यह मनसिलके नाम हैं (मनसिल लाल वर्णका पत्थरसा होता है, मनसल मनसिल इन नामोंसे प्रसिद्ध है) ॥१९३॥ उत्तम मनसिल । मनोह्वा त्वोड्रपुष्पाभा शस्यते सर्वकर्मसु ॥ १९४ ॥ मनसिल गुडहलके फूलके समान लाल वर्णवाला उत्तम होता है, वही सब कामोंमें लेना चाहिये ॥ १९४ ॥ अशुद्ध मनसिलके दोष । मनःशिला मन्दबलं च नूनं करोति जन्तोः शुभ- पाकहीना । मलन्तु बद्धं कुरुते च नूनं सशर्करं कृच्छ्रगदं करोति ॥ १९५ ॥ अशुद्ध मनसिल मनुष्यके बलको नष्ट करता है, मलको बद्ध, (कबजी) करता है, एवं शर्करा और मूत्रकृच्छ्र रोगको उत्पन्न करता है ॥ १९५ ॥ अश्मरीमूत्रहृद्रोगमशुद्धा कुरुते शिला । मन्दाग्निं मलदुष्टिं च शुद्धा सर्वरुजापहा ॥१९६॥ अशुद्ध मनसिल अश्मरी (पथरी) मूत्रकृच्छ्र हृद्रोग मंदाग्नि और मलको दूषित करता है और शुद्ध मनसिल संपूर्ण रोगोंको नाश करता है ॥ १९६ ॥ मनशिलशोधनविधि । जयन्तीभृङ्गराजोत्थै रक्तागस्त्यरसैः शिला।

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 75, कुल 584 में से · BharatKosha